ईद के शरई अहकाम(Eid Ke Sharai Ahkaam)Sahee Ahadees Se










ईद की वजह तस्मियह: (Hadees Ki Roshnime)
ईद की अस्ल लफ़्ज़ ऊद है जो आद-यऊद से मुश्तक़ है। जिसके माना रुजूअ् करने के हैं। ईदैन नाम इसलिए रखा गया है कि इन दोनों में इनायाते इलाही बे पायां होती हैं या यह कि मुसलमान इन दिनों की तरफ़ हर साल लौटते रहते हैं, या यह कि यह दोनों दिन हर साल लौट लौट कर मुकर्रर आते हैं, या यह कि इनके लौटने से ख़ुशी और मसर्रत लौटती है। यह आम इस्तिलाही माना में है और अरबों की इस्तिलाह में हर वह इज्तिमा जो ख़ुशी और मसर्रत का इज्मा हो 'ईद' कहलाता था। इसलिए इन दिनों को भी (ईदुल-फ़ित्र और ईदुल-अज़हा को) ईदैन कहा गया। (मरआतु जि 2, स. 327)

ईद के दिन ज़ेब व ज़ीनत करना:
सहीह बुख़ारी शरीफ़ में इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाहि अलैह ने यही बाब क़ायम किया और इस रिवायत से ईदैन में ज़ेब व ज़ीनत इख़्तियार करने और अच्छे लिबास पहनने का इस्तिदलाल किया है जिसमें है कि

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इमामुल् मुहद्दिसीन वल फ़ुक़हा इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाहि अलैह ने इसी रिवायत से इस्तिदलाल किया है कि ईद के दिन जाएज़ और उम्दा लिबास के साथ आराइश करनी चाहिए। इसके साथ ही ख़ुशबू भी लगाना चाहिए कि वह तो मुस्तक़िल एक सुन्नत है।

ईद के दिन रोज़ा रखना?

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फ़: इमाम नववी रहमतुल्लाहि अलैह कहते हैं कि इस पर इज्मा है कि ईदुल-फ़ित्र और ईदुल-अज़हा के दिन रोज़ा रखाना हराम है, ख़्वाह यह रोज़ा नज़्र का हो या नफ़्ल हो या कफ़्फ़ारे का रोज़ा हो या कोई और (अल-फ़त्हुर-रब्बानी ज. 10, स. 141)

ईदुल-फ़ित्र में जाने से पहले कुछ खा लेना:
हज़रत अनस रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ ईद की नमाज़ के लिए जाने से पहले चंद ताक़ अदद खजूरें खा लेते थे। (मालूम हुवा कि ईदुल-फ़ित्र में नमाज़ के लिए निकलने से पहले चंद खजूरें या कोई और मीठी चीज़ें खा लेना चाहिए।

ईद की नमाज़ के लिए एक रास्ते से जाए और दुसरे रास्ते से आए
इब्न उमर रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ﷺ ईद की नमाज़ के लिए एक रास्ते से जाते और लौटते दुसरे रास्ते से। (सहीह बुख़ारी, अबू दावूद)

ईदगाह में मिम्बर ना ले जाना:

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फ़: इस हदीस से इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाहि अलैह ने यह साबित किया है कि ईदगाह में मिम्बर ना बनाए जाएं और ना ही आरज़ी मिम्बर ले जाया जाए।

हुज़ूर ﷺ का तरीक़ा यह था कि आप आबादी के बाहर जाकर ईद की नमाज़ मैदान में पढ़ाते और अपने आगे बरछी (भाला) गाड़ लेते। यह आप का सुत्रह होता और इमाम का सुत्रह तमाम मुक़्तदियों के लिए काफ़ी है। (जैसा कि सहीह बुख़ारी में ही इमाम बुख़ारी रहिमहुल्लाह ने नक़्ल किया है।) बहर हाल इस रिवायत से यह साबित हुवा कि ईदगाह में बग़ैर मिम्बर के ख़ुत्बा देना नमाज़ के बअ्द ख़ुत्बा या बयान देना सुन्नत है। और नमाज़ से पहले ख़ुत्बा या बयान देना हुज़ूर ﷺ से साबित नहीं।

ईदैन की नमाज़ बग़ैर अज़ान व तकबीर के
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ईद की नमाज़ से क़ब्ल नफ़्ल वग़ैरा पढ़ना:
बअ्ज़ लोग ईद की नमाज़ से क़ब्ल नफ़्ल वग़ैरा पढ़ते हैं, यह दुरुस्त नहीं। हज़रत सालबा बिन ज़हदम रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि हज़रत अली रज़ियल्लाहू अन्हु ने अबू मस्ऊद रज़ियल्लाहू अन्हु को लोगों पर हाकिम मुक़र्रर किया। वह ईद के दिन निकले और कहा कि ऐ लोगो! (नमाज़े ईद में) इमाम से पहले पढ़ना सुन्नत नहीं है (नसाई जि. 1564)

ईदैन की नमाज़ ख़ुतबे से क़ब्ल पढ़ना:


ईदैन की नमाज़ कितनी रक्अत है?

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ईद की नमाज़ का वक़्त:
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ख़ुत्बे के लिए अच्छे लिबास पहनना:

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फ़: इससे यह भी साबित हुवा कि ईद के लिए ख़तीब अच्छे लिबास ज़ेबे तन कर सकता है और आम मुसलमानों को भी चाहिए कि उन्हें अल्लाह तआला ने जो अता किया है उसका इस्तिमाल करें।
इमाम का लोगों को सदक़ा करने के लिए रग़बत दिलाना दुरुस्त है:

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ख़ुत्बा मुतवस्सित पढ़ना:

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फ़: बअ्ज़ ख़तीबों की आदत होती है कि वह ख़ास मवाक़ेअ जैसे ईदैन या जुमा वग़ैरा का ख़ुत्बा इतना तवील देते हैं कि लोग उकता जाते हैं और आइन्दा ऐसे ख़तीबों के ख़ुत्बे में जान बूझ कर देर से आते हैं ताकि तवालत की वजह उकताहट ना हो। इन ख़तीबों को रसूलुल्लाह ﷺ की सुन्नत के मुवाफ़िक़ ख़ुत्बा मुख़्तसर और जामेअ् देना चाहिए ताकि लोगों की दिल चस्पी बरक़रार रहे और लोग उकता ना जाएं। इस मफ़्हूम की एक हदीस सहीह बुख़ारी में है कि रसूलुल्लाह ﷺ से बअ्ज़ सहाबा ने रोज़ाना ख़ुत्बा देने की फ़रमाइश की। मगर आप ने यह फ़रमाया कि अगर मैं रोज़ ख़ुत्बा दूंगा तो तुम जल्द ही उकता जाओगे। इसके बअ्द रसूलुल्लाह ﷺ ने ख़ुत्बे के लिए हफ़्ते का एक दिन मुक़र्रर कर दिया था और इसी दिन ख़ुत्बा देते थे।
ईद के दिन ख़ुशी से दफ़ बजाना:

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फ़: इस रिवायत से मौसीक़ी और गाने बजाने के दुरुस्त होने का इस्तिदलाल करना सहीह नहीं है। क्यूंकि बअ्ज़ रिवायतों से मज़ीद वज़ाहत है कि यह लड़कियां जंग बुआस के मुताल्लिक़ अशआर तरन्नुम के साथ दफ़ बजा कर गा रही थीं या पढ़ रही थीं। इसलिए मज़कूरा रिवायत से मौजूदा फ़हश व बे हंगम और बेहूदह या इश्कियह गानों को गाने और बजाने का इस्तिदलाल करना कम फ़हमी है।
ईदैन की नमाज़ में कौन सी सूरतें पढ़े:

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नसाई की रिवायत में है कि आप सब्बिहिस्म रब्बिकल् अअ्ला और हल अताक हदीसुल् ग़ाशिया भी पढ़ते थे।
ईद की नमाज़ का तरीक़ा
• ईद की नमाज़ के लिए भी दिल में निय्यत करें (निय्यत दिल के इरादे का नाम है) किसी भी सहीह मर्फ़ूअ् हदीस से अल्फ़ाज़ में निय्यत अदा करने का कोई सबूत नहीं है ।

• दोनों हाथों को कन्धों तक उठा कर तकबीरे तहरीमा यानी अल्लाहु अकबर कहें, फिर सीने पर हाथ बांध लें। सात मरतबा ज़ाइद तकबीरात कहें। फिर दुआ सना (सुबहानक अल्लाहुम्मा या अल्लाहुम्मा बाइद बैनी) मुकम्मल पढ़ें। फिर सूरह फ़ातिहा पढ़ें (इमाम व मुक़तदी सभी लोग) फ़िर सिर्फ़ इमाम सूरह आला या सूरह क़ॉफ़ की तिलावत करे, मुक़तदी ख़ामोशी से सुनें। और फिर आम नमाज़ों की तरह तमाम अरकान इत्मिनान व सुकून से अदा करते हुए पहली रक्अत मुकम्मल करें और जब दूसरी रक्अत के लिए खड़े हों तो पहले पाँच तकबीरात कहें और फिर तमाम लोग सूरह फ़ातिहा (दिल में) पढ़ें सिवाए इमाम के। इमाम जहरन सूरह फ़ातिहा पढ़े और इसके बअ्द सूरह ग़ाशिया या सूरह क़मर की तिलावत करे और फिर हस्बे मामूल दूसरी रक्अत मुकम्मल करें। और दूसरी रक्अत में तशह्हुद के बअ्द सलाम फेरें।

• तकबीराते ज़वाइद के साथ रफ़उल यदैन किसी सहीह हदीस से साबित नहीं है। (बुख़ारी, मुस्लिम, तिर्मिज़ी, इब्न माजा, दारमी, अबू-दाऊद)

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