Roze Ka Maksad Aur Uske Takaaje( sahee ahaadees ki roshnime)

             रोजों के मक़ासिद और उसके तक़ाज़े



يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَي الَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُوْنَ Ĭ١٨٣İ
{ऐ ईमान वालो! तुम पर रोज़े इसी तरह फ़र्ज़ किए गए जिस तरह उन लोगों पर फ़र्ज़ किए गए थे जो तुम से पहले गुज़र चुके हैं ताकि तुम गुनाहों से बचो।}(सूरह बक़रा। आयत नंबर। 183)

अल्लाह रब्बुल् इज़्ज़त ने इस आयत के आख़िरी टुकड़े İ ल-अ़ल्लकुम तत्तक़ून Ĭ से रोज़े का मक़्सद बयान फ़रमाया और वह यह है कि मोमिन के अन्दर तक़वा पैदा हो। लफ़्ज़ तक़वा बड़ा ही जामेअ् लफ़्ज़ है जो कई पहलुओं का इहाता कर लेता है। एक तो यह कि आदमी नेकी की राह चलता रहे और इस राह में आने वाली तमाम दुशवारियों पर हत्तल् मक़दूर क़ाबू पाने की कोशिश करता रहे और नेकी की इस राह में चलते वक़्त अपने दामन को इस तरह बचाता चले जिस तरह कोई ख़ारदार रास्तों से गुज़रते वक़्त अपना दामन समेत कर और संभाल कर चलता है। नेकी का काम करते रहना और बुराईयों से बचते रहने का नाम ही तक़वा है और यह सिफ़त आदमी के अन्दर उस वक़्त पैदा होती है जब उसके दिल में अपने 
ख़ालिक़ व मालिक का ख़ौफ़ पैदा हो।

सौम के लुग़वी मअना İ इम्साक Ĭ यानी रुके या बाज़ रहने के हैं। और शरई इस्तिलाह में यह एक ऐसी इबादत है जिसमें मोमिन सुबह सादिक़ से ग़ुरूबे आफ़्ताब तक खाने पीने और अपनी बीवी से जिमा (हम बिस्तरी) करने से रुक जाता है। लेकिन रोज़े का मतलब सिर्फ़ इतना नहीं है कि आदमी सिर्फ़ खाने पीने से किसी भी तरह बाज़ रहे और बाक़ी मुआमलात में अपनी मन मानी हरकत करे बल्कि रोज़े के और भी कई तक़ाज़े हैं। अगर आदमी इन तक़ाज़ों को पूरा ना करे तो उसका रोज़ा बे मक़्सद है। इमाम बुख़ारी से मरवी है कि
                 हमसे आदम बिन अबी इयास ने बयान किया कहा हमसे इब्न अबी ज़ीब ने बयान किया उन से सईद मक़बरी ने उन से उनके वालिद कैसान ने और उन से अबू हुरैरह रज़ियल्लाहू अन्हु ने कि रसूल ﷺ ने फ़रमाया अगर कोई शख़्स झूठ बोलना और दग़ाबाज़ी करना (रोज़े रख कर भी ना छोड़े) तो अल्लाह तआला को इसकी कोई ज़रूरत नहीं कि वह अपना खाना पीना छोड़ दे। (बुख़ारी शरीफ़, पारा।7, बाब: जो शख़्स रमज़ान में झूठ बोलना और दग़ाबाज़ी करना ना छोड़े, हदीस नंबर 1776)
इस हदीस से मालूम हुवा कि जो शख़्स रोज़ा रख कर भी बुराईयों से नहीं बचता उसका रोज़ा अल्लाह तआला के नज़दीक बे वज़न है। उसका रोज़ा रखना या ना रखना सवाब के ऐतेबार से बराबर है। इस हदीस से यह भी पता चलता है कि रोज़े का तक़ाज़ा यह है कि आदमी रोज़े की हालत में झूठ ना बोले और ना किसी से दग़ाबाज़ी करे। एक दूसरी हदीस में आप ﷺ ने रोज़े का मक़्सद इस तरह बयान फ़रमाया:
                                                             
                                                          हमसे अली बिन अब्दुल्लाह ने बयान किया उन से अबू दाइल ने और उन से हुज़ैफ़ा रज़ियल्लाहू अन्हु ने बयान किया कि मैंने सुना है आप ﷺ ने फ़रमाया था कि इन्सान के लिए उसके बाल बच्चे, उसका माल और उसके पड़ोसी फ़ितना (आज़माइश और इम्तिहान) हैं जिसका कफ़्फ़ारा नमाज़, रोज़ा और सदक़ा बन जाता है …… … (बुख़ारी शरीफ़), पारा नंबर 7, बाब: रोज़ा गुनाहों का कफ़्फ़ारा होता है। हदीस नंबर 1768)

इस हदीस से यह बात मालूम हुई कि इन्सान अपने बाल बच्चों की मुहब्बत में और उनकी ज़रूरियात की तकमील के लिए कुछ ना कुछ गुनाह कर बैठता है, इस तरह वह माल जमा करने की धुन में हलाल व हराम की तमीज़ फ़रामोश करके कुछ गुनाह के काम में मुलव्विस हो जाता है, आदमी जिन लोगों के साथ जितना क़रीब रहता है उन्हीं लोगों के साथ लड़ाई झगड़ा और ज़्यादती का इम्कान होता है और सब से ज़्यादा क़रीब वह अपने पड़ोसी के साथ रहता है। अपने पड़ोसी के हुक़ूक़ की अदाएगी ना करके भी वह फ़ितने में पड़ जाता है, लेकिन जिस तरह नमाज़ और सदक़ा उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाते हैं इसी तरह रोज़े का मक़्सद भी यही है कि उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाता है।

                     एक और हदीस में आप ﷺ ने फ़रमाया
हमसे अब्दुल्लाह बिन मस्लमह क़अ्नबी ने बयान किया उन से इमाम मालिक रहमतुल्लाह उन से अबुज़ ज़िनाद ने और उन से अबू हुरैरह रज़ियल्लाहू अन्हु ने कि रोज़ा दोज़ख़ से बचने के लिए एक ढाल है। इसलिए (रोज़ेदार) ना फ़हश बातें करे और ना जिहालत की बातें करे और अगर कोई शख़्स उससे लड़े या उसे गाली दे तो उसका जवाब यह होना चाहिए कि इन्नी साइम यानी मैं रोज़ेदार हूं और यह अल्फ़ाज़ वह दोबार कहे। उस ज़ात की क़सम जिसके हाथ में मेरी जान है, रोज़ेदार के मूँह की बू अल्लाह के नज़दीक मुश्क की ख़ुशबू से भी ज़्यादा पसंदीदा और पाकीज़ा है। (अल्लाह तआला फ़रमाता है) बन्दा अपना खाना पीना और अपनी शहवात मेरे लिए छोड़ देता है रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूंगा। और दूसरी नेकियों का सवाब भी अस्ल नेकी के दस गुनाह होता है। (बुख़ारी शरीफ़ पारा नंबर 17, बाब रोज़े की फ़ज़ीलत का बयान, हदीस नंबर 1767)

हदीस से साफ़ तौर से मालूम होता है कि रोज़ा बन्दे को दोज़ख़ से बचाने का काम करता है लेकिन ऐसा उसी वक़्त हो सक्ता है जब हम रोज़े के तक़ाज़े को पूरा करें। यह हदीस रोज़ादार से दो तक़ाज़े करती है एक तो यह कि वह फ़ह्हाशी से इज्तिनाब करें, इसका मतलब यह है कि वह अपनी निगाहों को बे हयाई के मन्ज़र देखने से बचाए, चाहे वह हक़ीक़ी हों या तस्वीरी, उसे बे हयाई की किसी भी जगह पर नहीं जाना चाहिए और ना ही बे हयाई की जगह पर बैठना चाहिए। यहां तक कि बेहूदह ख़यालात से भी उसे अपने ज़हन को पाक रखना चाहिए। इसी तरह ज़बान से भी बे हयाई की बातें नहीं निकलनी चाहिएं। दुसरे यह कि ला तज्हल यानी जिहालत की बातें ना करे। जिहालत की बातों में तमाम बुरे काम शामिल हैं मसलन लड़ाई झगड़ा करना या गाली गलोज करना वग़ैरा, इसीलिए आप ﷺ ने आगे फ़रमाया कि अगर तुम से कोई लड़ाई पर आमादा हो या गाली गलोज करे तो तुम इसका जवाब दो कि इन्नी साइम अगर तुम भी लड़ाई झगड़े पर उतर आए तो ज़ाहिर सी बात है कि तुम भी गाली गलोज करोगे और यह जिहालत की बात होगी। इसी तरह ठठे बाज़ी करना, क़हक़हा बाज़ी करना, फ़ुज़ूल गोई और हंसी मज़ाक़ की बातें करने से आदमी को रुक जाना चाहिए इसके बरख़िलाफ़ इसे अपना ज़्यादा तर वक़्त क़ुरआन की तिलावत में लगाना चाहिए। तब उसके अन्दर संजीदगी, कम गोई और ख़ुश मिज़ाजी पैदा होगी। अल्लाह तआला के नज़दीक रोज़ेदार के मूँह की बू मुश्क की ख़ुशबू से भी ज़्यादा पसंदीदा है और पाकीज़ा, लिहाज़ा हमें फ़हश बातें करके रोज़े की बू को मकरूह और बदबूदार नहीं बनाना चाहिए।

हमसे अब्दान ने बयान किया, उन से हम्ज़ह ने, उन से अअ्मश ने उन से इब्राहीम ने उन से अल्क़मह ने बयान किया कि मैं अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहू अन्हु के साथ जा रहा था। आप ने कहा कि हम नबी करीम ﷺ के साथ थे तो आप ने फ़रमाया कि अगर कोई साहिबे ताक़त हो तो उसे निकाह कर लेना चाहिए, क्योंकि यह नज़र को नीची रखने और शर्मगाह को बद फ़अ्ली से महफूज़ रखने का ज़रिया है और किसी में निकाह करने की ताक़त ना हो तो उसे रोज़े रखने चाहिएं, क्यूंकि वह उसकी शहवत को ख़त्म कर देता है। (बुख़ारी शरीफ़, पारा नंबर 7, बाब: जो मुजर्रद हो और ज़िना से डरे तो वह रोज़ा रखे, हदीस नंबर 1778) इस हदीस से भी रोज़े का एक मक़्सद यह मालूम हुवा कि रोज़ा आदमी की शहवानी ख़्वाहिशात पर क़ाबू पाने का एक ज़रिया है। और रोज़े का तक़ाज़ा यह है कि आदमी को अपनी निगाह को शहवत अंगेज़ मनाज़िर देखने से बचाए।

अगर एक रोज़ेदार रोज़े के मक़्सद और उसके तक़ाज़े को मल्हूज़ रख कर रोज़ा रखेगा तो यक़ीनन उसे उसकी तमाम बरकतें हासिल होंगी और अल्लाह तआला ना सिर्फ़ उसके गुनाहों को बख़्श देगा बल्कि उसे अपने ख़ुसूसी इनामात से भी नवाज़ेगा, 
                                              जिसे आप ﷺ ने एक हदीस में इस तरह फ़रमाया हमसे इब्राहीम बिन मूसा बिन मूसा ने बयान किया कहा कि हम को हिशाम बिन यूसुफ़ ने ख़बर दी, उन्हें जुरैज ने कहा कि मुझे अता ने ख़बर दी, उन्हें अबू सॉलेह जो रोग़ने ज़ैतून बेचता था उन्होंने अबू हुरैरह रज़ियल्लाहू अन्हु से सुना कि रसूले करीम ﷺ ने फ़रमाया अल्लाह पाक फ़रमाता है कि इन्सान का हर नेक अमल ख़ुद उसी के लिए है मगर रोज़ा, कि वह ख़ास मेरे लिए है और मैं ही इसका बदला दूंगा और रोज़ा गुनाहों की एक ढाल है। अगर कोई रोज़े से हो तो उसे फ़हश गोई नहीं करना चाहिए और ना झगड़ना चाहिए, अगर कोई शख़्स उसको गाली दे या लड़ना चाहे तो उसका जवाब सिर्फ़ यह हो कि मैं रोज़ेदार हूं उस ज़ात की क़सम जिसके हाथ में मुहम्मद ﷺ की जान है, रोज़ेदार के मूँह की बू अल्लाह तआला के नज़दीक मुश्क की ख़ुशबू से भी ज़्यादा बेहतर है । और रोज़ेदार को दो ख़ुशियाँ हासिल होंगी एक तो जब वह इफ़्तार करता है तो ख़ुश होता है और दुसरे जब वह अपने रब से मुलाक़ात करेगा तो अपने रोज़े का सवाब पा कर ख़ुश होगा।(बुख़ारी शरीफ़,पारा नंबर 7, बाब:कोई रोज़ा दार को अगर गाली दे तो उसे क्या कहना चाहिए कि मैं रोज़े से हूं हदीस नंबर 1777) 

आदमी को यह दोनों ख़ुशियाँ उस वक़्त हासिल हो सक्ती हैं जब वह अपने रोज़े पर निगरानी रखे और इसके मक़ासिद के हासिल करने की कोशिश करे और इसके तक़ाज़ों को पूरा करने का ख़याल रखे। अल्लाह तआला हमें इन तमाम बातों की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन

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