Fazilat-e-Ramazan (Ramzan Ki Fazilat)

                          फ़ज़ाइले रमज़ान 


                           रमज़ानुल मुबारक का महीना अपनी तमाम तर जल्वा सामानियों के साथ साया फ़िगन हो चुका है। रियाज़त व इबादात का यह मुक़द्दस महीना अपने दामन में रहमत व मग़्फ़िरत और निजात के ख़ज़ाने ले कर आता है और असियान के ख़स व ख़ाशाक को जला कर चला जाता है।
यह महीना दरहक़ीक़त तक़वा की तरबियत का महीना है। इस्लाम ने तक़वा पर बहुत ज़्यादा ज़ोर दिया है। क़ुरआन व हदीस में बार बार तक़वा इख़्तियार करने की ताकीद व तल्क़ीन की गई है। तक़वा ही दीन की असास है। और मोमिनों के किरदार साज़ी की ख़िश्ते अव्वल है।


İ كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَي الَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُوْنَ Ĭ
पहली उम्मतों पर भी रोज़े इसीलिए फ़र्ज़ किए गए थे ताकि वह तक़वा व परहेज़गारी इख़्तियार करें और उम्मते मुस्लिमा जिसे ख़ैरे उम्मत कहा गया है और अम्र बिल् मअ़्-रूफ़ व नही अ़निल् मुन्कर का फ़रीज़ा सौंपा गया है बदर्जे ऊला इसकी मुस्तहिक़ है कि तक़वा की तरबियत के लिए इसे रियाज़त व नफ़्स कशी की कड़ी आज़माइश से गुज़रना पड़े। क्योंकि जब तक इन्सान रियाज़त की आग में तप कर मुख़्लिस नहीं हो जाता वह तक़वा के आला मियार पर पूरा नहीं उतरता। तक़वा से मुसलमान मोमिन कामिल बनता है जो एक मिसाली इन्सान होता है और वही दीन व दुनिया में इज़्ज़त व तकरीम का हक़दार होता है। अल्लाह के नज़दीक तकरीम व तमजीद का मियार तक़वा ही है:


İاِنَّ اَکْرَمَکُم عِنْدَاللہ اَتْقَاکُمĬ
रमज़ान का महीना सब्र का है और सब्र भी तक़वा का एक हिस्सा है। रोज़े दार अपने रब की रज़ा के लिए नफ़्स कशी और रियाज़त करता है और इन सख़तियों पर सब्र करता है। तरग़ीबाते नफ़्स, जिस्मानी तक़ाज़े, मौसम की सख़्तियां, तबीअत का इज़मिहलाल कोई भी चीज़ इसे इस रियाज़त से बाज़ नहीं रख सक्ती। जिस पर वह अपने अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए अमल पैरा है। बज़ाहिर यह एक ऐसी आज़माइश है जिसे पूरा करना उमूमन इन्सान की वुसअत से बाहर है लेकिन सिर्फ़ रज़ाए इलाही की ख़ातिर रोज़ेदार इस तकलीफ़ मालाइताक़ को बर्दाश्त करता है और अल्लाह के हुक्म की बजा आवरी का क़वी जज़्बा भी यह सारी तकालीफ़ बर्दाश्त करने का हौसला अता करता है, फिर जैसा कि क़ायदा है आज़माइश जितनी कड़ी हो, इम्तिहान जितना सख़्त हो, उसका सिला भी उतना ही अज़ीम और दिल कश होता है। चुनांचे एक हदीसे क़ुदसी में है:


﴿اَلْصِّیَامُ لِی وَاَنَا اَجْزَی بِہ ﴾
{रोज़ा मेरे लिए है और मैं ही इसका सिला दूंगा।}
गोया रोज़ा एक ऐसी इबादत है जो मोमिन और इसके माबूद के दरमियान बराहे रास्त मुआमलात का ज़रिया है और यह एक ऐसा एज़ाज़ है जिस पर रोज़ा दार जिस क़द्र नाज़ करे कम है।
रमज़ान ग़म ख़्वारी का महीना है। रोज़ेदार अपने ऊपर भूक प्यास की तकालीफ़ तारी करके इस तजरुबा से गुज़रता है जो एक मुफ़्लिस व मुहताज को बर्दाश्त करनी पड़ती हैं। ज़ाहिर है जब तक इन्सान किसी कैफ़ियत से ख़ुद दो-चार ना हो वह इस मुसीबत में गिरिफ़्तार किसी दुसरे के दुख दर्द का पूरी तरह अंदाज़ा नहीं कर सकता। भूक प्यास की शिद्दत सह कर ही मोमिन को यह सबक़ मिलता है कि जब वह शिकम सैर होकर खाए तो अपने उन भाईयों को भी याद रखे जिन्हें रूखी सूखी भी मयस्सर नहीं है। अल्लाह के इन ज़ईफ़ व मिस्कीन बन्दों की ख़बरगीरी व दस्तगीरी करना मोमिन का फ़र्ज़ है और अहले तक़वा का यही शिआर है।
भूक इन्सानी मुआशरा की वह बुनयादी अहतियाज है जिसे पूरा किए बग़ैर ज़िंदगी का तसव्वुर भी मुम्किन नहीं है। इन्सान बरहना रह सकता है, मकान ना हो तो खुले आस्मान के नीचे बसर कर सकता है। जंगलों या पहाड़ों की खूह में ज़िंदगी गुज़ार सकता है। लेकिन अगर पेट को रिज़्क़ ना मिले तो ज़िन्दा रहना ही मुम्किन नहीं है। भूक प्यास की शिद्दत मंक इन्सान इन्सान नहीं रहता, वहशी और मुजरिम बन जाता है। बहुत से जराइम की तह में पेट का भी हिस्सा होता है। भूक इन्सान से वह सब कुछ करा लेती है जिस का आम हालात में कोई तसव्वुर करना भी पसन्द ना करे। इस्लाम दीने फ़ितरत है और इसने इन्सान की इस कमज़ोरी को पूरी तरह समझा है। यही वजह है कि क़ुरआने मजीद में मिस्कीनों को खाना खिलाने और इसकी तरग़ीब देने की ताकीद व तल्क़ीन की गई है। कहीं इबरत व मौइज़त के अंदाज़ में ज़िक्र है कहीं वईद या बशारत के तौर पर है:


İوَلَا یَحُضُّ عَیٰव طَعَامِ الْمِسْکِیْنِĬ
मसाकीन को खाना खिलाने की तरग़ीब नहीं देता। एक जगह नेकोकारों का ज़िक्र करते हुए इरशाद है:
İوَ يُطْعِمُوْنَ الطَّعَامَ عَلٰي حُبِّهٖ مِسْكِيْنًا وَّ يَـتِـيْمًا وَّ اَسِيْرًا ۝Ĭ
{वह अल्लाह की रज़ा के लिए मिस्कीनों, यतीमों और असीरों को खाना खिलाते हैं और कहते हैं कि हम महज़ अल्लाह की रज़ा के लिए तुम्हें खाना खिला रहे हैं। और तुम से किसी तशक्कुर या इम्तिनान की तमन्ना नहीं रखते।}
और एक जगह इरशाद होता है कि जब अहले जन्नत दोज़ख़ियों से सवाल करेंगे:


مَا سَلَكَكُمْ فِيْ سَقَرَ ؀
तुम जहन्नम में क्यूं डाले गए तो वह जवाब देंगे

﴿ لَمْ نَكُ مِنَ الْمُصَلِّيْنَ ؀ وَلَمْ نَكُ نُطْعِمُ الْمِسْكِيْنَ﴾
हम नमाज़ नहीं पढ़ते थे और मसाकीन को खाना नहीं खिलाते थे। इस तमाम ताकीद व तल्क़ीन, इल्मी तरबियत व आज़माइश का मक़्सद यही है कि इन्सान की इस बुनयादी ज़रूरत को पूरा किया जाए। इसे भूक और इफ़्लास से निजात दिलाई जाए। फ़ुक़्र व इफ़्लास से बचाया जाए जो इन्सान 
को कुफ़्र तक पहुंचा देता है


रमज़ान की रियाज़त, सदक़तुल् फ़ित्र, ज़कात व इन्फ़ाक़ का मुदआ यही है कि कोई भूका, नंगा ना रहे दौलत का चंद हाथों में इर्तिकाज़ ना हो। सरमायादारी की वह शक्ल पैदा ना हो जो महाजनी मुआशरा को जनम देती है और दौलत को माबूद बना देती है। इस्लाम ने ऐसे लोगों को जो दौलत जमा करने में लगे रहते हैं और इसे अल्लाह के बन्दों पर ख़र्च नहीं करते बड़ी सख़्त तम्बीह की है।

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