तफ़्सीर आयात रमज़ान
يٰٓاَيُّهَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ كَمَا كُتِبَ عَلَي الَّذِيْنَ مِنْ قَبْلِكُمْ لَعَلَّكُمْ تَتَّقُوْنَ İ١٨٣Ĭاَيَّامًا مَّعْدُوْدٰتٍ ۭ فَمَنْ كَانَ مِنْكُمْ مَّرِيْضًا اَوْ عَلٰي سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ اَ يَّامٍ اُخَرَ ۭ وَعَلَي الَّذِيْنَ يُطِيْقُوْنَهٗ فِدْيَةٌ طَعَامُ مِسْكِيْنٍ ۭ فَمَنْ تَطَوَّعَ خَيْرًا فَهُوَ خَيْرٌ لَّهٗ ۭ وَاَنْ تَصُوْمُوْا خَيْرٌ لَّكُمْ اِنْ كُنْتُمْ تَعْلَمُوْنَ İ ۱۷۴Ĭ
((ऐ ईमान वालो!तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए जिस तरह तुम से अगले लोगों पर फ़र्ज़ के गए थे। ताकि तुम बच जाओ। गिनती के चंद ही दिन हैं, लेकिन तुम में से जो शख़्स बीमार हो या सफ़र में हो तो वह और दिनों मैं इस गिनती को पूरा करे। ताक़त रखने वाले फ़िद्या में एक मिस्कीन को खाना दें और जो शख़्स नेकी में सबक़त करे वह इसी के लिए बेहतर है लेकिन तुम्हारे हक़ में अफ़्ज़ल काम रोज़े रखना ही है अगर तुम बाअ़लम हो।))
यहां अल्लाह तआला ईमान वालों को मुख़ातिब करके हुक्म दे रहा है कि तुम रोज़े रखो। रोज़े के माना अल्लाह तआला के फ़रमान की बजा आवरी की ख़ालिस निय्यत के साथ खाने पीने और जिमा से रुक जाने के हैं इससे फ़ाएदा यह होता है कि इन्सान का नफ़्स अ ख़ला क़ रज़ीला से पाक साफ़ हो जाता है यह रोज़ा ख़ास इस उम्मत के लिए मख़्सूस नहीं बल्कि फ़रमाया कि तुम से पहली जितनी उम्मतें गुज़रें सब पर फ़र्ज़ था। तुम इस नेक काम में इन उम्मतों से पीछे ना रह जाना जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है :
’’ لکل جعلنا منکم شرعۃ ومنہاجاً ولوشاء اللہ لجعلکم امہ واحدۃ ولکن لیبلوکم فیما اتاکم فاستبقوالخیرات ۔
यानी हर एक के लिए एक तरीक़ा और रास्ता है। अगर अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक ही उम्मत कर देता लेकिन वह तुम्हें आज़मा रहा है तुम्हें चाहिए कि नेकियों में सबक़त करते रहो और यहां जो कहा ल-अ़ल्लकुम तत्तक़ून इसलिए कि रोज़े में बदन की पाकी है और शैतान के रास्तों को बंद करना है। इसीलिए सहीहैन में आया है ऐ जवानों! तुम में से जिसमें निकाह की ताक़त हो वह निकाह करे और जिसे ताक़त ना हो वह रोज़े रखे। इसके लिए यह ख़स्सी होना है। आगे रोज़ों की मिक़दार बताते हुए फ़रमाया कि यह गिनती के चंद रोज़ हैं जो लोगों पर दुशवार नहीं ।
शुरू इस्लाम में हर माह तीन दिन के रोज़ा का हुक्म था फिर सौम रमज़ान से वह हुक्म मंसूख़ हो गया हज़रत मुआज़, इब्न मसऊद, हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुम, अता, क़तादा और दह्हाक रहिमहुमुल्लाह का फ़रमान है कि हज़रत नूह अलैहिस् सलाम के ज़माने से हर महीने में तीन रोज़ों का हुक्म था जो हुज़ूर ﷺ की उम्मत के लिए बदला और इन पर इस मुबारक महीने के रोज़े फ़र्ज़ हुए। हसन बसरी रहमतुल्लाहि अलैह फ़रमाते हैं कि अगली उम्मतों पर भी मुकम्मल एक महीने के रोज़े फ़र्ज़ थे। हज़रत इब्न उमर रज़ियल्लाहू अन्हु अल्लाह अन्हु फ़रमाते हैं कि अगली उम्मतों को यह हुक्म था कि जब वह इशा की नमाज़ अदा कर लें और सो जाएं तो इन पर खाना पीना, औरतों से मुबाशरत करना हराम हो जाता था। हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हु फ़रमाते हैं अगले लोगों से मुराद अहले किताब हैं।
अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है तुम में से जो शख़्स माहे रमज़ान में बीमार हो या सफ़र में हो तो वह इस हालत में रोज़े छोड़ दे मशक़्क़त ना उठाए और इसके बअ्द इन दिनों में जबकि सेहत याब हो और हालते क़ियाम में हो इस वक़्त इनकी क़ज़ा कर ले। हाँ इब्तिदाए इस्लाम में जो शख़्स तंदुरुस्त हो और मुसाफ़िर भी ना हो इसके लिए भी इख़्तियार था ख़्वाह रोज़ा रखे, ख़्वाह ना रखे और फ़िद्या में मिस्कीन को खाना खिला दे। अगर एक से ज़्यादा को खिलाए तो अफ़्ज़ल था गो रोज़ा रखना फ़िद्या देने से ज़्यादा बेहतर था। इब्न मसऊद, इब्न अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हुम, मुजाहिद, ताउस और मुक़ातिल रहिमहुमुल्लाह वग़ैरा यही फ़रमाते हैं। मुसनद अहमद में हज़रत मुआज़ बिन जबल रज़ियल्लाहू अन्हु फ़रमाते हैं नमाज़ की और रोज़े की तीन हालतें बदल गईं। पहले तो सोलह सुत्रह महीना तक मदीना में आकर हुज़ूर ﷺ ने बैतुल मक़्दिस की तरफ़ नमाज़ अदा की। फिर क़द नरा वाली आयत उतरी और मक्का शरीफ़ की तरफ़ आप ने मूँह फेरा। दूसरी तब्दीली यह हुई कि नमाज़ के लिए एक दुसरे को पुकारता था और जमा हो जाते थे लेकिन इससे आख़िर आजिज़ हो गए। फिर एक अन्सारी हज़रत अब्दुल्लाह बिन ज़ैद बिन अब्दे रब्बह रज़ियल्लाहू अन्हु हुज़ूर ﷺ की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया रसूलुल्लाह ﷺ मैंने ख़्वाब में देखा वह ख़्वाब गोया बेदारी की सी हालत में था कि एक शख़्स सब्ज़ रंग का हुल्ला पहने हुए है और क़िबले की तरफ़ मूतवज्जा होकर कह रहा है अल्लाहु अकबर अल्लाह अकबर … अश्हदु अन ला इलाहा इल्लल्लाह दोबार ग़र्ज़ यूंही अज़ान पूरी की फिर थोड़ी देर के बअ्द इसने तकबीर कही जिसमें क़द क़ामत अस-सलात भी दो मरतबा कहा। रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया (हज़रत) बिलाल रज़ियल्लाहू अन्हु को यह सिखाओ वह अज़ान कहेंगे चुनांचे सब से पहले हज़रत बिलाल रज़ियल्लाहू अन्हु ने अज़ान कही। दूसरी रिवायत में है कि हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने भी आकर अपना यही ख़्वाब बयान किया था लेकिन इन से पहले हज़रत ज़ैद रज़ियल्लाहू अन्हु आ चुके थे। तीसरी तब्दीली यह हुई कि पहले यह दस्तूर था कि हुज़ूर ﷺ नमाज़ पढ़ा रहे हैं, कोई आया कुछ रकातें हो चुकी हैं तो वह किसी से दरयाफ़्त करता कि कितनी रकातें हो चुकी हैं। वह जवाब देता कि इतनी रकातें पढ़ ली हैं वह इतनी रकातें अदा करता। फिर हुज़ूर ﷺ के साथ मिल जाता हज़रत मुआज़ रज़ियल्लाहू अन्हु एक मरतबा आए और कहने लगे कि मैं हुज़ूर ﷺ के सलाम फेरने के बअ्द अदा कर लूंगा। चुनांचे इन्होंने यही किया और आ हज़रत ﷺ के सलाम फेरने के बअ्द अपनी गई हुई रकातें अदा करने के लिए खड़े हुए। आं-हज़रत ﷺ ने इन्हें देख कर फ़रमाया (हज़रत) मुआज़ रज़ियल्लाहू अन्हु ने तुम्हारे लिए यह अच्छा तरीक़ा निकाला है, तुम भी अब यूं ही किया करो। यह तीन तब्दीलियां तो नमाज़ की हुईं, रोज़ों की तब्दीलियां अव्वल जब नबी ﷺ मदीना में आए तो हर महीने में तीन रोज़े रखते थे और आशूरे का रोज़ा रखा करते थे फिर अल्लाह तआला ने कुतिब अलैकुमुस् सियाम नाज़िल फ़रमा कर रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ किए। दूसरी इब्तिदाअन यह हुक्म था जो चाहे रोज़ा रखे जो चाहे रोज़ा ना रखे और फ़िद्या दे दे। फिर यह आयत उतरी फ़मन शहिद मिनकुम वश् शहर फ़ल यसुम्मुहु तुम में से जो शख़्स रमज़ान के महीने में क़ियाम की हालत में हो वह रोज़ा रखा करे। पस जो शख़्स मुक़ीम हो मुसाफ़िर ना हो, तंदुरुस्त हो बीमार ना हो इस पर रोज़ा रखना ज़रूरी हो गया। हाँ बीमार और मुसाफ़िर के लिए रुख़सत मिली और ऐसा बूढ़ा जो रोज़े की ताक़त ही ना रखता हो इसे भी रुख़सत दी गई। तीसरी हालत यह कि इब्तिदा में खाना पीना, औरतों के पास आना। सोने से पहले पहले जाएज़ था। सो गया तो फिर गोया रात को ही जागे लेकिन खाना पीना और जिमा इसके लिए मना था फिर सरमह नामी एक अन्सारी सहाबी रज़ियल्लाहू अन्हु दिन भर काम काज करके रात को थके हारे घर आए। इशा की नमाज़ अदा की और नींद आ गई। दुसरे दिन कुछ खाए पिए बग़ैर रोज़ा रखा लेकिन हालत बहुत नाज़ुक हो गई। हुज़ूर ﷺ ने पूछा कि यह क्या बात है? तो इन्होंने सारा वाक़िया कह सुनाया। इधर यह वाक़िया तो इनके साथ हुवा। उधर हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हु ने सो जाने के बअ्द अपनी बीवी साहिबा से मुजामिअत कर ली और हुज़ूर ﷺ के पास आकर हसरत व अफ़्सोस के साथ अपने इस क़सूर का इक़रार किया, जिस पर यह आयत :
احل لکم لیلۃ الصیام الرفث الی نسآئکم سے ثم اتموالصیام الی اللیل
तक नाज़िल हुई, और मग़रिब के बअ्द से लेकर सुबह सादिक़ के तुलूअ् होने तक रमज़ान की रातों में खाने, पीने और मुजामिअत करने की रुख़सत दी गई। बुख़ारी व मुस्लिम में हज़रत आइशा सिद्दीक़ह रज़ियल्लाहू अन्हु से मरवी है कि पहले आशूरह का रोज़ा रखा जाता था। जब रमज़ान की फ़र्ज़ियत नाज़िल हुई तो अब ज़रूरी ना रहा जो चाहता रख लेता जो ना चाहता ना रखता। हज़रत इब्न उमर रज़ियल्लाहू अन्हु और हज़रत इब्न मसऊद रज़ियल्लाहू अन्हु से भी यह मरवी है व अ़लल् लज़ीन यत्बक़ूनह का मतलब हज़रत मुआज़ रज़ियल्लाहू अन्हु यह बयान फ़रमाते हैं कि इब्तिदाए इस्लाम में जो चाहता रोज़ा रखता जो ना चाहता ना रखता और हर दिन के बदले एक मिस्कीन को खाना खिला देता। हज़रत सलमा बिन अक्वअ् रज़ियल्लाहू अन्हु से भी सहीह बुख़ारी में एक रिवायत आई है कि इस आयत के नाज़िल होने के वक़्त जो शख़्स चाहता इफ़्तार करता और फ़िद्या दे देता। यहां तक कि इसके बअ्द की आयत उतरी और यह मंसूख़ हुई।
रोज़ा एक क़दीम इबादत है जो आदम अलैहिस् सलाम से लेकर इस वक़्त तक यकसां फ़र्ज़ रही। अल्लाह ने किसी को रोज़ों की फ़र्ज़ियत से ख़ाली नहीं छोड़ा।
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شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِيْٓ اُنْزِلَ فِيْهِ الْقُرْاٰنُ ھُدًى لِّلنَّاسِ وَ بَيِّنٰتٍ مِّنَ الْهُدٰى وَالْفُرْقَانِ ۚ فَمَنْ شَهِدَ مِنْكُمُ الشَّهْرَ فَلْيَصُمْهُ ۭ وَمَنْ كَانَ مَرِيْضًا اَوْ عَلٰي سَفَرٍ فَعِدَّةٌ مِّنْ اَيَّامٍ اُخَرَ ۭ يُرِيْدُ اللّٰهُ بِكُمُ الْيُسْرَ وَلَا يُرِيْدُ بِكُمُ الْعُسْرَ وَلِتُكْمِلُوا الْعِدَّةَ وَلِتُكَبِّرُوا اللّٰهَ عَلٰي مَا ھَدٰىكُمْ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُوْنَ İ ١٨٥Ĭ
((माहे रमज़ान वह है जिसमें क़ुरआन उतारा गया जो लोगों को हिदायत करने वाला है और जिसमें हिदायत की और हक़ व बातिल की तमीज़ की निशानियाँ हैं तुम में से जो शख़्स इस महीने में मुक़ीम हो इसे रोज़ा रखना चाहिए। हाँ जो बीमार हो या मुसाफ़िर हो इसे दुसरे दिनों में यह गिनती पूरे करनी चाहिए। अल्लाह तआला का इरादा तुम्हारे साथ आसानी का है सख़्ती का नहीं वह चाहता है कि तुम गिनती पूरी कर लो और अल्लाह तआला की दी हुई हिदायत पर इसकी बड़ाइय्यां बयान करो और इसका
शुक्र करो।)) (सूरह अल-बक़रा। अल-आयत 185)
अल्लाह पाक ने इस आयत में माहे रमज़ान की मन्क़बत और मदह बयान फ़रमाई कि तमाम महीनों में से इस महीने को क़ुरआने पाक के नाज़िल करने के लिए पसन्द फ़रमाया। हदीस में आया है कि यह वह महीना है जिसमें अल्लाह की किताबें पैग़म्बरों पर उतरा करती थीं। इमाम अहमद ने वासिलह बिन अल-अस्क़अ् से मरफ़ूअ़न रिवायत किया है कि सहीफ़ा इब्राहीम अलैहिस् सलाम रमज़ान की पहली रात में उतरा। तौरात छट्टी रमज़ान को, इन्जील तेरहवीं रमज़ान को क़ुरआन चौबीसवीं रमज़ान को नाज़िल हुवा। ग़र्ज़ जितने सहीफ़े और कुतुब जिस नबी व रसूल पर नाज़िल हुईं यकबारगी ही नाज़िल हुईं लेकिन क़ुरआने पाक बैतुल् इज़्ज़ह से आस्माने दुनिया पर शबे क़द्र में नाज़िल हुवा जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है :
इन्ना अन्ज़ल्नाहु फ़ी लैलतुल् क़द्र और इन्ना अन्ज़ल्नाहु फ़ी लैलतू मुबारका और उन्ज़िल फ़ीहिल् क़ुरआन। क़ुरआने करीम एक साथ आस्मान अव्वल पर रमज़ानुल मुबारक के महीने में लैलतुल् क़द्र को नाज़िल हुवा और इसी को लैलतू मुबारका भी कहा है। फिर थोड़ा थोड़ा अलग अलग वाक़िआत और हादिसात के मुताबिक़ नाज़िल होता रहा, इसी तरह कई तरीक़ से इब्न अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हु से मरवी है और यही मतलब है इस आयत وقال الذین کفرو………بمثل الاجتناک بالحق واحسن تفسیرا ग़र्ज़ कि जब मुश्रिकीन कोई झगड़ा लाते तो अल्लाह तआला इनका जवाब देता और आप ﷺ के दिल को बरक़रार और मज़बूत रखता और वक़्तन फ़-वक़्तन नाज़िल करता है फिर रमज़ानुल मुबारक की बड़ाई और फ़ज़ीलत के बअ्द क़ुरआने पाक की बुज़ुर्गी बयान फ़रमाई कि यह वह चीज़ है जिस से बन्दों के दिलों को हिदायत होती है वह बन्दे जो इस पर ईमान लाए हैं इसकी तस्दीक़ करते हैं इसके ताबे हैं। निशानियों से मुराद दलीलें, हुज्जतें हैं। खुली खुली साफ़ साफ़ जो दलालत करती हैं हिदायत पर जो गुमराही के मनाफ़ी है। और हक़ को बातिल से और हराम को हलाल से जुदा करती हैं बअ्ज़ लोगों का कहना है कि फ़क़त रमज़ान कहना मुनासिब नहीं है बल्कि माहे रमज़ान या शहरे रमज़ान कहना चाहिए लेकिन इनका कहना ठीक नहीं है। इसलिए कि सहीह बुख़ारी में हदीस है कि आप ने फ़रमाया कि من صام رمضان ایمانا واحتسابا غفرلہ ما تقدم من ذنبہ यानी जो शख़्स रमज़ान के रोज़े ईमान और नेक निय्यती के साथ रखे इसके सब अगले गुनाह बख़्श दिए जाते हैं। इससे मालूम हुवा कि दोनों तरह बोलना दुरुस्त है। इस आयत में वुजूबे सौम पर दलील है इस शख़्स के लिए जो मुक़ीम हो मुसाफ़िर ना हो। सेहत याब हो मरीज़ ना हो, रमज़ान का चाँद पाया हो, हाँ अगर मुसाफ़िर और मरीज़ हो तो इसके लिए रुख़सत है कि वह दुसरे दिनों में क़ज़ा कर लें अल्लाह तआला को आसानी मंज़ूर है मुश्किल नहीं। सहाबा व ताबईन की एक जमात का यह मज़हब है कि सफ़र में रोज़ा ना रखना वाजिब है क्यूंकि अल्लाह तआला फ़रमाता है दुसरे दिनों में इनको पूरा करो। मगर सहीह क़ौल यह है कि मुसाफ़िर को इख़्तियार है वह रोज़ा रखे या ना रखे हदीस शरीफ़ में है कि सहाबा किराम रसूलुल्लाह ﷺ के हमराह रमज़ानुल मुबारक में निकलते कोई रोज़े से होता और कोई नहीं और एक दुसरे पर कोई ऐब नहीं लगाता, अगर रोज़ा ना रखना वाजिब होता तो ज़रूर रोज़ा का इनकार किया जाता बल्कि ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ से हालते सफ़र में रोज़ा रखना साबित है सहीहैन में हज़रत अबू अद-दर्दा से मरवी है रसूलुल्लाह ﷺ के साथ माहे रमज़ान में निकले गर्मी निहायत सख़्त थी लोग मारे गर्मी के हाथ सर पर रखते हम में से कोई रोज़ेदार ना था सिवाए रसूलुल्लाह ﷺ और अब्दुल्लाह बन रवाहह रज़ियल्लाहू अन्हु के।
सहीहैन में हदीस है कि जब रसूलुल्लाह ﷺ ने हज़रत मुआज़ और हज़रत अबू मूसा रज़ियल्लाहू अन्हुम को यमन की तरफ़ भेजा तो फ़रमायातुम दोनों ख़ुश ख़बरियां देना, नफ़रत ना दिलाना, आसानियां करना सख़्तियां ना करना, आपस में इत्तिफ़ाक़ से रहना इख़्तिलाफ़ ना करना, सुनन और मसानीद में है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया मैं यक तरफ़ा नर्मी और आसानी वाले दीन के साथ भेजा गया हूं। पस आयत का मतलब यह हुवा कि मरीज़ और मुसाफ़िर वग़ैरा को यह रुख़सत देना और इन्हें माज़ूर जानना इसलिए है कि अल्लाह तआला का इरादा आसानी का है सख़्ती का नहीं, और क़ज़ा का हुक्म गिनती पूरी करने के लिए है और इस रहमत व नेअ्मत और हिदायत और इबादत पर तुम्हें अल्लाह तबारक व तआला की बड़ाई और ज़िक्र करना चाहिए ।
अल्लाह की बड़ाई करने का मतलब यह है कि जब इबादत कर चुके तो अल्लाह का ज़िक्र करे तकबीर कहे जिस तरह ख़त्म रमज़ान के बअ्द नमाज़े ईद को जाते हुए अल्लाहु अकबर वग़ैरा का ज़िक्र किया करते हैं जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है : जब अहकामे हज अदा कर चुको तो अल्लाह का ज़िक्र करो। दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया : नमाज़े जुमा की अदाइगी के बअ्द नमाज़ पूरी हो जाए तो ज़मीन में फैल जाओ रिज़्क़ तलाश करो और अल्लाह का ज़िक्र ज़्यादा करो ताकि तुम्हें फ़लाह मिले। दूसरी जगह फ़रमाया : सूरज के निकलने से पहले, सूरज के डूबने से पहले, रात को और सजदों के बअ्द अल्लाह की तस्बीह बयान करो। इसीलिए हदीस में है कि हर फ़र्ज़ नमाज़ के बअ्द अल्लाह की तस्बीह, तह्मीद और तकबीर पढ़ी जाए।
हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हु से रिवायत है कि हम रसूलुल्लाह ﷺ का नमाज़ से फ़ारिग़ होना सिर्फ़ अल्लाहु अकबर की आवाज़ें से जानते थे। यह आयत दलील है इस अम्र की कि ईदुल-फ़ित्र में भी तकबीर पढ़नी चाहिए ।

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