फित्रह का मक़्सद:
रमज़ानुल मुबारक का महीना नेकियों का महीना है। एक मोमिन रोज़ेदार हर मुम्किन कोशिश करता है कि इस माहे मुबारक में ज़्यादा से ज़्यादा नेकियां हासिल कर ले और गुनाहों से दूर रहे और यही रोज़े का मक़सूद भी है, लेकिन मुसलमान बशरी तक़ाज़े के तहत ब-हालते सौम ग़लतियां भी दानिस्ता व नादानिस्ता कर बैठता है। बहुत सारी ग़लतियां तो ऐसी होती हैं कि जिन से हर हाल में बचते रहना चाहिए, लेकिन कुछ ग़लतियां ऐसी भी हैं जो ग़ैर इरादी तौर से सरज़द हो जाती है। जिन से रोज़े की क़ुबूलियत ही ग़ैर यक़ीनी हो जाती है, चुनांचे ऐसी छोटी छोटी ग़लतियों की तलाफ़ी के लिए और इन से रोज़ों को पाक करने के लिए रसूलुल्लाह ﷺ ने सदक़तुल् फ़ित्र को फ़र्ज़ क़रार दिया।
फित्रह की फ़र्ज़ियत:
हर वह मुसलमान ख़्वाह मर्द हो या औरत, आज़ाद हो या ग़ुलाम, बूढ़ा हो या बच्चा जिसके पास ईद के दिन अपने अहल व अयाल की ख़ूराक से ज़ाइद इतना हो कि सब की तरफ़ से एक साअ् ग़ल्ला दे सके उस पर सदक़ए फ़ित्र फ़र्ज़ है, शरीअत में कहीं भी साहिबे निसाब होने की शर्त नहीं बताई गई। बल्कि एक आम हुक्म है:
عن عبداللہ بن عمر رضی اللہ عنہ ان رسول اللہ صلوسلم عل فرض زکاۃ الفطر من رمضان صاعاً من تمرٍ وصاعاً من الشعیرٍ علی العبدوالحرّ والذکر والانثیٰ والصغیر والکبیر من المسلمین
Hadees
और जो लोग साहिबे निसाब होने की शर्त लगाते हैं वह सख़्त ग़लती पर हैं, क्यूंकि अहादीस़ से इसका सहीह सबूत नहीं मिलता है।
फित्रह के मुस्तहिक़:
चूंकि फित्रह का अस्ल मक़्सद ही यही है कि ईद के दिन कोई भी मुसलमान भूका ना रहे और उसके घर में खाने पीने की तंगी ना हो। इसलिए उसके हक़ीक़ी मुस्तहक़ीन ग़ुरबा व फ़ुक़रा व मसाकीन, यतीम बच्चे व बेवा हैं। इसमें भी इस अम्र का लिहाज़ रखा जाए कि क़राबतदारों और अहले मुहल्लह को तरजीह हासिल हो।
फित्रह की अदाएगी का वक़्त:
امر رسول اللہ صلوسلم عل بزکاۃ الفطر قبل خروج الناس الی الصلوۃ
Hadees
बुख़ारी शरीफ़ की एक रिवायत से मालूम होता है कि अब्दुल्लाह बिन
उमर रज़ियल्लाहू अन्हु और सहाबा किराम फित्रह ईद से एक या दो दिन क़ब्ल दे दिया करते थे, इसलिए एक दो दिन पहले भी दिया जा सकता है ज़रूरी
नहीं कि ईद की चाँद रात को ही दिया जाए।
फित्रह की मिक़दार और जिन्स:
सदक़ए फ़ित्र में अनाज व ग़ल्ला ही देना मस्नून अमल है। रसूलुल्लाह ﷺ और सहाबा किराम का तआम्मुल इसी पर था। क़ीमत की अदाएगी का कोई सबूत नहीं है। ग़ल्ला और अनाज देने में जो हिकमत पोशीदा है वह क़ीमत की अदाएगी में नहीं लिहाज़ा खजूर, जौ, गेहूँ या कोई भी आला दर्जे का अनाज ही दिया जाए। इसमें यह बात मल्हूज़ है कि जो भी अनाज दें एक फ़र्द की जानिब से एक साअ् हिजाज़ी दें। साअ् हिजाज़ी (यानी जिस से नबी करीम ﷺ और सहाबा किराम दिया करते थे) की मिक़दार मौजूदा हिन्दुस्तानी वज़न के हिसाब से दो किलो छे सौ पचास ग्राम है। इसी मुनासिबत से तमाम अहले ख़ाना की जानिब से फित्रह अदा किया जाए हत्ता कि एक शव्वाल की शब नौ-मौलूद बच्चे की जानिब से भी दिया जाए।
हिजाज़ी व इराक़ी साअ् का फ़र्क़:
हिजाज़ी इराक़ी
आधा सेर =1 रत्ल आधा सेर =1 रत्ल
एक तिहाई रत्ल = 1 मुद 2 रत्ल =1 मुद
चौथाई मुद = अ साअ् 4 मुद = अ साअ्
इससे मालूम हुवा कि मुद के वज़न की कमी बेशी की वजह से साअ् में भी कमी बेशी है। अहले इराक़ के नज़दीक साअ् 8 रत्ल है जिसका हिन्दुस्तानी वज़न 4 सेर है और अहले हिजाज़ के नज़दीक साअ् 5 एक तिहाई रत्ल का है यानी 2 सेर और 11 छटांक का है।
चूंकि रसूलुल्लाह ﷺ हिजाज़ के रहने वाले थे इसलिए शरई पैमाना वही समझा जाएगा जो आप के इलाक़े में राइज था। और आप ﷺ इससे लिया दिया करते थे।



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