ज़कात … फ़ाएदे और उसके मसारिफ़(jakaat ke bareme Sahee ahadees)
















ज़कात इस्लाम का एक अहम फ़रीज़ा है जो क़ुरआन, अहादीसे रसूल ﷺ और इज्मए उम्मत से साबित है, जो शख़्स इसकी फ़र्ज़ियत का इनकार करे वह बिला शुबह काफ़िर और मुर्तद होगा, अगर उसने तौबा की तो उसकी तौबा मक़बूल होगी वरना उसे क़त्ल कर दिया जाएगा और अगर किसी ने बुख़्ल से काम लिया या कुछ दिया तो उसका शुमार ज़ालिमीन में से होगा और वह सज़ा का मुस्तहिक़ होगा, अल्लाह तआला का फ़रमान है।

Quraan Ki Aayat


Hadees



और अल्लाह तआला का इरशाद है يٰٓاَيُّھَا الَّذِيْنَ اٰمَنُوْٓا اِنَّ كَثِيْرًا مِّنَ الْاَحْبَارِ وَ الرُّهْبَانِ لَيَاْكُلُوْنَ اَمْوَالَ النَّاسِ بِالْبَاطِلِ وَ يَصُدُّوْنَ عَنْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ۭ وَ الَّذِيْنَ يَكْنِزُوْنَ الذَّهَبَ وَ 
الْفِضَّةَ وَ لَا يُنْفِقُوْنَهَا فِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ ۙ فَبَشِّرْهُمْ بِعَذَابٍ اَلِيْمٍ ؀(

Quran Ki Aayat



Hadees


ज़कात के दीनी फ़वाइद:
ज़कात के बहुत सारे दीनी, अख़्लाक़ी व समाजी फ़ाएदे हैं।
٭ इस्लाम के एक ऐसे अहम फ़र्ज़ की अदाएगी है जिस पर दुनिया व आख़िरत में बन्दे की सआदत का दार-व-मदार है।
٭ ज़कात की अदाएगी बन्दे को अल्लाह से क़रीब करती है और ईमान में ज़्यादती का सबब बनती है ।
٭ ज़कात की अदाएगी पर बन्दा एक अज्रे अज़ीम का हक़दार होता है 
इरशादे बारी तआला है

Quran Ki Aayat


, يَمْحَقُ اللّٰهُ الرِّبٰوا وَ يُرْبِي الصَّدَقٰتِ ۭ وَ اللّٰهُ لَا يُحِبُّ كُلَّ كَفَّارٍ اَثِيْمٍ ؁ 
  दूसरी जगह इरशाद फ़रमाया وَمَآ اٰتَيْتُمْ مِّنْ رِّبًا لِّيَرْبُوَا۟ فِيْٓ اَمْوَالِ النَّاسِ فَلَا يَرْبُوْا عِنْدَ اللّٰهِ ۚ وَ مَآ اٰتَيْتُمْ مِّنْ زَكٰوةٍ تُرِيْدُوْنَ وَجْهَ اللّٰهِ فَاُولٰۗىِٕكَ هُمُ الْمُضْعِفُوْنَ ؀ 

 तुम(सूरह रूम:39)
٭ नबी करीम ﷺ का इरशाद है कि जिसने अपनी पाकीज़ा कमाई से एक खजूर के बराबर भी सदक़ा किया और अल्लाह तआला सिर्फ़ पाकीज़ा कमाई ही क़ुबूल करता है, तो अल्लाह तआला उसे अपने दाहिने हाथ में लेता है और उसे साहिबे माल के लिए बढ़ाता है, जिस तरह तुम में से कोई शख़्स अपने माल को बढ़ाता है, यहां तक कि वह पहाड़ के मानिन्द हो 
जाता है।

٭ अल्लाह तआला ज़कात के ज़रिए ग़लतियों को मिटा देता है, जिस तरह पानी आग को बुझा देता है। यहां पर सदक़ा से मुराद ज़कात और सदक़ा 
दोनों हैं।

ज़कात के अख़्लाक़ी फ़वाइद:
٭ ज़कात अपने अदा करने वालों को करीमुन् नफ़्स और सख़ी लोगों के ज़ुमरह में कर देती है।
٭ ज़कात अपने अदा करने वालों को रहम और शफ़क़त की सिफ़ात से मुत्तसिफ़ करती है और रहम करने वालों पर अल्लाह रहम फ़रमाता है।
٭ आम तौर पर देखा गया है कि मुसलमानों को माली या जिस्मानी फ़ाएदा पहुंचाने से क़ल्ब में वुसअत, दिल में इम्बिसात व ख़ुशी हासिल होती है और अपने भाईयों को वह जिस क़द्र फ़ाइदा पहुंचाता है वह उसी क़द्र उसको महबूब व मुकर्रम बना देता है।

٭ इसी तरह ज़कात अपने अदा करने वालों को जूद व सख़ा से माला माल कर देती है। क़सादते क़ल्बी और संग दिली जैसे मूज़ी मर्ज़ से छुटकारा 
देती है। 

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ज़कात के इज्तिमाई फ़वाइद:
٭ ज़कात से ग़ुरबत और मुहताजी का ख़ात्मा हो जाता है ।
٭ इसी तरह ज़कात मुसलमानों की क़ुव्वत में इज़ाफ़ा और इन्हें रफ़अत अता करती है, इसी वजह से अल्लाह रब्बुल् इज़्ज़त ने मसारिफ़े ज़कात से जिहाद में ख़र्च करने की ताकीद की है, इन शा अल्लाह हम आगे मुफ़स्सल अलग से इसका ज़िक्र करेंगे।

٭ ज़कात के ज़रिए उस मर्ज़ का भी इलाज हो जाता है, जो फ़ुक़रा और
मसाकीन के दिलों में हसद व कीना की शक्ल में पैदा हो जाता है। क्यूंकि जब ग़ुरबा व फ़ुक़रा दौलतमन्दों को दुनियावी लज़्ज़तों से लुत्फ़ अन्दोज़ होते और उनके ठाट बाट को देखते हैं तो लाज़मी तौर पर अपनी बे बज़ाअती और ग़ुरबत की वजह से दिलों में अदावत और उनके ख़िलाफ़ बग़ावत के जज़्बात पैदा होते हैं, क्यूंकि उन्होंने अपने माल में से अपने ग़रीब भाईयों का हक़ नहीं दिया और ना उनकी ज़रूरियात की परवाह की और अगर दौलतमंद हज़रात अपने माल में से साल में एक मरतबा ज़कात निकाल कर अपने मुफ़्लिस व ग़रीब भाईयों की ख़ुश्क हलक़ को तर करें और उनके पेट की आग बुझाईं तो यक़ीनन उनके दिलों में इन से मुहब्बत पैदा होगी और यह अहसास पैदा होगा कि हमारे मालदार भाईयों ने हमारी क़द्र 
की।

٭ ज़कात देने से माल में इज़ाफ़ा और बरकत होती है जैसा कि आं-हज़रत ﷺ ने फ़रमाया कि सदक़े से माल में कमी नहीं होती, अगरचा देखने में कम दिखाई देता है और ना ही बरकत ख़त्म होती है, बल्कि अल्लाह तआला इसके बदले मज़ीद अता फ़रमाता है और उस माल में बरकत होती है। यह सब ज़कात के फ़वाइद हैं जो फ़र्द और सोसाइटी की इस्लाह के लिए बहुत ज़रूरी है।
दर्जे ज़ेल चीज़ों में ज़कात वाजिब है:
सोने और चांदी की ज़कात का निसाब चालिस्वां हिस्सा यानी ढाई फ़ीसद है और आज कल के वज़न के मुताबिक़ चांदी का वज़न 565 ग्राम और सोने का वज़न 85 ग्राम हो तो इस पर ज़कात वाजिब है।

सोना व चांदी नक़द की शक्ल में हो, टिकया की शक्ल में हो, ज़ेवरात में तब्दील हो गया हो, हर सूरत में ज़कात फ़र्ज़ है, इसी वजह से औरतों के उन सोना चांदी के ज़ेवरात पर जो निसाब तक पहुंच गए हों चाहे वह इस्तिमाल करती हों या किसी जगह में ब-हिफ़ाज़त रखती हों, ज़कात फ़र्ज़ है। जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि हज़रत अब्दुल्लाह बिन अम्र बिन अल-आस से रिवायत है कि एक सहाबियह अपनी साहिबज़ादी के साथ नबी करीम ﷺ की ख़िदमत में आईं और इनकी बेटी के हाथ में दो सोने के कंगन थे? तो आप ने फ़रमाया: ऐ बी! क्या तुमने इनके ज़कात निकाली है, तो इन्हों ने कहा कि नहीं, तो आप ने फ़रमाया, क्या तुम यह पसन्द करती हो कि अल्लाह रब्बुल् इज़्ज़त इनके बदलने आग के कंगन पहनाए? इतना सुनना था कि दोनों कंगन निकाल कर इसने आं-हुज़ूर सल्लल्लाहु अल्लाह की ख़िदमत में पेश कर दिए। (साहिबे बुलूग़ुल् मराम ने कहा कि रवाहु अस-सलासहु व इस्नादुहु क़वी)

इसी तरह वह तमाम चीज़ें जो तिजारत की ग़र्ज़ से रखी हों मसलन ज़मीन, गाड़ियां, जानवर, कपड़े और दुकान की चीज़ें सब पर ढाई फ़ीसद ज़कात वाजिब है, चे जाई कि इन तमाम चीज़ों में नुक़्सान हुवा हो या नफ़ा, और अगर ज़मीन गाड़ी और इसके अलावा दूसरी ऐसी चीज़ें जो किरायए के लिए रखी हुई हैं उन पर ज़कात नहीं, जैसा कि नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि ग़ुलाम और घोड़े पर ज़कात नहीं है। अगर उसकी उजरत पर एक साल गुज़र गया हो और वह माल निसाब तक पहुंच गया हो तो उसमें ज़कात वाजिब है।
मुस्तहक़ीने ज़कात:
मुस्तहक़ीने ज़कात की तअ्यीन ख़ुद रब्बुल आलमीन ने अपने कलाम पाक में कर दी है, इरशादे बारी है,: اِنَّمَا الصَّدَقٰتُ لِلْفُقَرَاۗءِ وَ الْمَسٰكِيْنِ وَ الْعٰمِلِيْنَ عَلَيْهَا وَ الْمُؤَلَّفَةِ قُلُوْبُهُمْ وَ فِي الرِّقَابِ وَ الْغٰرِمِيْنَ وَفِيْ سَبِيْلِ اللّٰهِ وَابْنِ السَّبِيْلِ ۭفَرِيْضَةً مِّنَ اللّٰهِ ۭ وَ اللّٰهُ عَلِيْمٌ حَكِيْمٌ ؀ 

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फ़क़ीर:
फ़क़ीर से मुराद वह शख़्स है जिसके पास इतनी पूंजी ना हो कि आधे साल तक अपने बाल बच्चों की ख़ूराक व पोशाक मुहय्या कर सके, ऐसे लोगों की इतनी मदद करनी चाहिए कि वह साल भर सुख और चैन की ज़िंदगी गुज़ार सकें।

मसाकीन:
मसाकीन वह लोग हैं जिनके पास आधे साल या इससे ज़ाइद की मईशत हो, तो ऐसे लोगों को एक साल के लिए लवाज़िमे ज़िंदगी मुहय्या करना अख़्लाक़ी फ़र्ज़ है, हाँ अगर कोई ऐसा शख़्स हो जिस के पास नक़द रुपया पैसा नहीं है ,लेकिन खेती, नौकरी या इसके अलावा कोई दूसरा ज़रिया मआश हो और वह आसूदा हो तो ऐसे शख़्स को ज़कात नहीं देना चाहिए। जैसा कि आं हुज़ूर ﷺ ने फ़रमाया है कि बरसरे रोज़गार और मालदारों के लिए ज़कात में कोई हिस्सा नहीं।

महसूलीने ज़कात:
महसूलीने ज़कात वह लोग हैं जो किसी ख़ैराती इदारे या किसी जमइय्यत के अमीर के हुक्म की ताबेदारी में दूर दराज़ गांव, देहात में साहिबे निसाब से ज़कात वसूल करके मुस्तहक़ीने ज़कात तक पहुंचाते हैं, तो ऐसे लोगों को इनकी महनत व काविश के मुताबिक़ ज़कात से दे देना चाहिए, अगरचा वह मालदार ही क्यूं ना हो, यह उनका हक़ है।
ख़ानदान के वह लोग जिनका ईमान कमज़ोर फुसफुसा हो तो ऐसे लोगों की ज़कात से मदद करनी चाहिए, ताकि उनके ईमान में क़ुव्वत पैदा हो और वह मुस्तक़बिल में दाई और हक़ के मुबल्लिग़ बनें। लेकिन आम लोगों को जिनका ईमान कमज़ोर हो उनको ज़कात देना क्या है? बअ्ज़ लोगों का ख़याल है उनको भी दिया जाएगा, क्यूंकि दीन की मस्लिहत जिस्मानी मस्लिहत से ज़्यादा अहमियत रखती है। और बअ्ज़ उलमा किराम की राए यह है कि ऐसे शख़्स को ज़कात नहीं दी जाएगी, क्यूंकि यह इन्फ़िरादी फ़ाएदा है।

ग़ुलाम को आज़ाद करना:
ज़कात के ज़रिए मासूम व बेगुनाह क़ैदियों को ज़ालिम व जाबिर पोलिस के चुंगुल से छुड़ाना।
मक़रूज़:
मक़रूज़ ऐसे लोग हैं जिनके पास इतना माल नहीं कि अपने क़र्ज़ को अदा कर सकें तो ऐसे लोगों को क़र्ज़ की अदाएगी के लिए ज़कात दी जाएगी, अगरचा कि इनके पास खाने पीने की चीज़ें वाफ़र मिक़दार में मौजूद हों। उलमा किराम का इस मस्अले में इख़्तिलाफ़ है कि अगर बाप या बेटा मक़रूज़ हो तो क्या ज़कात के माल से उसके क़र्ज़ की अदाएगी की जा सक्ती है या नहीं? राजेह क़ौल यह है कि जब साहिबे ज़कात को पूरा यक़ीन हो कि मक़रूज़ शख़्स क़र्ज़ अदा नहीं कर सकता तो वह इसे बग़ैर इत्तिला के जिसे क़र्ज़ देना है उसको उसका माल वापस कर दे।
फ़ी सबीलिल्लाह:
मुजाहिदों को माले ज़कात से मदद करनी चाहिए और ज़कात के माल से हथियार वग़ैरा ख़रीदना चाहिए और ऐसे ही उन तालिबे इल्मों की मदद करनी चाहिए जो इल्मे दीन हासिल कर रहे हैं

मुसाफ़िर:
ऐसा मुसाफ़िर जिसका रास्ते में ज़ादे सफ़र ख़त्म हो गया हो और वह अपनी मंज़िले मक़सूद तक पहुंच सके।
यही वह मुस्तहक़ीने ज़कात हैं जिनका ज़िक्र रब्बुल आलमीन ने अपनी किताब में किया है, इन्ही पर ज़कात ख़र्च करनी चाहिए और यही हुक्मे इलाही है। जब हम मसारिफ़े ज़कात के इन पहलूओं पर ग़ौर करते हैं तो हमें मालूम होता है कि इनमें से बअ्ज़ तो बज़ाते ख़ुद ज़कात के मुस्तहिक़ हैं और बअ्ज़ को सिर्फ़ इसलिए दी जाती है कि मुसलमानों को इनकी ज़रूरत होती है, ज़कात के वाजिब करने में भी हिकमत है कि एक सॉलेह और ख़ुद कफ़ील मुआशरा की दाग़ बेल डाली जाए। (माख़ूज़: सिराते मुस्तक़ीम। बर्मिंघम,लन्दन)

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