औरतों का ईदगाह जाना
जिस तरह औरतों का मसाजिद जाना सुन्नत है इसी तरह औरतों और लड़कियों का ईद गाह जाना भी सुन्नत है। औरतों के लिए ईदगाह या मसाजिद में जाने की मुमानिअत ना ही क़ुरआन में कहीं मज़्कूर है और ना ही अहादीस़े सहीहा में। इस सिलसिले की चंद अहादीस़ मुलाहिज़ा हों।
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फ़: इस हदीस पर इमाम बुख़ारी रहमतुल्लाहि अलैह ने यह बाब क़ायम किया है कि औरतों और हैज़ वालियों का ईदगाह जाना (उम्मे अतिया रज़ियल्लाहू अन्हा की इस रिवायत से पता चलता है कि हुज़ूर ﷺ ईदगाह में औरतों को ले जाने की सिर्फ़ तरग़ीब ही नहीं देते थे बल्कि ताकीदन हुक्म भी देते थे। ख़ुद हुज़ूर ﷺ और सहाबा किराम रज़ियल्लाहू अन्हु अपनी अज़वाज और साहिब ज़ादियों को लेकर ईद की नमाज़ के लिए ईदगाह जाते थे। इस हदीस से यह भी निकलता है कि जो औरतें ईदगाह आतीं इन्हें पर्दे का पूरा इहतिमाम रखना चाहिए। और अपनी ज़ीनत को छुपाना चाहिए।
जब रसूलुल्लाह ﷺ ने सहाबियात रज़ियल्लाहू अन्हु को सड़क के किनारे से चलने का हुक्म दिया था तो बअ्ज़ सहाबियात इतनी किनारे से चलती थीं कि इनकी चादरें मकान की दीवारों से रगड़ खा जाती थीं।
ईद की नमाज़ के लिए मर्दों, बच्चों, नौजवानों, बूढ़ों और औरतों के साथ साथ नौजवान लड़कियों, यहां तक हाइज़ह औरतों को भी ले जाना अहम तरीन सुन्नते रसूल ﷺ है। जिस नबी ﷺ ने औरतों को ईदगाह जाने का हुक्म दिया यह इसी का हक़ था कि वहां की मुमानिअत कर दे लेकिन आपकी मदनी ज़िंदगी में ख़वातीन बा-क़ाइदा आम नमाज़ों में मसाजिद में और ईद की नमाज़ के लिए ईदगाह तशरीफ़ ले जाती थीं। अब नबी करीम ﷺ के अलावा किसी को यह हक़ नहीं कि वह नबी ﷺ के हुक्म के ख़िलाफ़ कोई मुमानिअत का फ़तवा दे या पाबंदी लगाए और अगर किसी उज़्र के तहत ही आप ﷺ को ख़वातीन को रोकना मक़सूद होता तो आप इन ख़वातीन को ज़रूर ईदगाह आने से रोक देते जो हाइज़ह होती थीं।
लेकिन आप ने इन्हें भी आने का हुक्म दिया, हालांकि यहां एक शरई उज़्र था। इसी तरह अगर ख़वातीन को ईदगाह से रोकना मक़सूद होता तो उन ख़वातीन को मुस्तस्ना क़रार देते जिनके पास चादरें नहीं थीं, लेकिन इसके बावजूद आप ﷺ ने हुक्म दिया कि उसकी सहेली उसे अपनी चादर (या बुर्क़ह) में लेकर आए। लेकिन आप ने हाइज़ह और बे चादर (बे बुर्क़ह) वाली को ना आने की रुख़सत नहीं दी।
तमाम मुसलमानों का एक साथ ईद की नमाज़ के लिए जमा होना इस्लामी शान व शौकत का बेहतरीन मुज़ाहिरा है और यह एक इस्लामी शिआर है।
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फ़: इस रिवायत के आख़िरी अल्फ़ाज़ पर ग़ौर कीजिए कि रसूलुल्लाह ﷺ ने ईद के इस मज्मअ को जो कि ईदगाह पर होता है (और इसमें औरतें, मर्द, बच्चे, बूढ़े, जवान और बापर्दा ख़वातीन व दोशीज़ाएं भी शरीक होते हैं) इसे हुज़ूर ﷺ ने ख़ैर (भलाई) से तअ्बीर किया है। अब जबकि ख़ुद रसूलुल्लाह ﷺ ईद के इस मज्मअ को ख़ैर से तअ्बीर करते हैं और ख़वातीन व पर्दा दार लड़कियों को पर्दे के साथ इस ख़ैर में शरीक होने का हुक्म देते हैं तो अब हम में से किस की यह जुरअत है कि रसूलुल्लाह ﷺ के इस हुक्म की ख़िलाफ़ वर्ज़ी करे और फ़ितना और माहौल ख़राब होने का बहाना करके औरतों को ईदगाह से और इस ख़ैर से रोके?
हाइज़ह औरतों पर नमाज़ माफ़ है मगर ईद का मज्मअ चूंकि बक़ौल रसूलुल्लाह ﷺ ख़ैर का मज्मअ है, इसलिए इस मौक़े पर हुज़ूर ﷺ ने हाइज़ह औरतों का भी इस मज्मअ में शरीक होने का हुक्म दिया है।
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