शबे क़द्र, लैलतुल् मुबारकह(Shabe qdra sahee Hadees ki Roshnime)
















Quraan Ki Aayat


Tarjuma
हमने इस (क़ुरआन को शबे क़द्र में उतारा और तुमने क्या समझा कि शबे क़द्र क्या है? शबे क़द्र हज़ार महीनों से अफ़्ज़ल है, इसमें फ़रिश्ते, रूहुल क़ुद्स (हज़रत जिब्रईल अलैहिस् सलाम) के साथ अपने रब के हुक्म से हर बात का इंतिज़ाम करने को उतरते हैं और सुबह तक यह सलामती की 
रात क़ायम रहती है।


लैलतुल् क़द्र या अल-लैलतु मुबारका का वजूद, उसके फ़ज़ाइल और उसका रमज़ान शरीफ़ में होना यह चीज़ें नस्स क़ुरआनी और अहादीसे सहीहा से साबित हैं।
Aayat

 अल्लाह तआला फ़रमाते हैं شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِيْٓ اُنْزِلَ فِيْهِ الْقُرْاٰنُ … (सूरह बक़रा। आयत 185)

 रमज़ान का महीना वह है जिसमें क़ुरआन नाज़िल किया गया। सूरह दुख़ान में اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ فِيْ لَيْلَةٍ مُّبٰرَहमने इस (क़ुरआन) को लैलतू मुबारका में नाज़िल किया दूसरी जगह सूरह क़द्र में फ़रमाया कि हमने इसको लैलतुल् क़द्र में नाज़िल किया इसके साथ ही हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा ने बयान किया कि नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया शबे क़द्र को रमज़ान के आख़िरी अश्रह की ताक़ रातों में ढूंडो (हदीस नंबर 1881 बुख़ारी शरीफ़) इन आयात व हदीस से ब-सराहत यह बात साबित होती है कि शबे क़द्र माहे रमज़ान के आख़िरी अश्रह की ताक़ रातों में होती है।

सूरतुल् क़द्र के शाने नुज़ूल के सिलसिले में वाहिदी ने अपनी सनद के साथ मुजाहिद से नक़्ल किया है? रसूलुल्लाह ﷺ ने बनी इस्राईल में से एक शख़्स का ज़िक्र फ़रमाया जिसने एक हज़ार महीने तक अल्लाह की राह में जिहाद किया था, इसको सुन कर मुसलमानों को बेहद ताज्जुब हुवा इस पर यह सूरह नाज़िल हुई। इमाम मालिक रहमतुल्लाहि अलैह अपने मुवत्ता में नक़्ल करते हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ को अपनी उम्मत की उमरें कम होने का अहसास हुवा, जबकि पहली उम्मतों की उमरें बहुत तवील हुवा करती थीं, पस अल्लाह तआला ने आप ﷺ को लैलतुल् क़द्र अता फ़रमाई जिस से आपकी उम्मत को तसल्ली देना मक़सूद था जिनकी उमरें बहुत छोटी हैं और यह रात एक हज़ार महीने से बेहतर इनको दी गई। उम्मते मुहम्मदिया पर अल्लाह तआला का यह बहुत बड़ा इनाम है कि इसने सिर्फ़ एक रात को हज़ार महीने जिन में लैलतुल् क़द्र ना हो अता फ़रमाई। अब यह हमारा फ़र्ज़ बनता है कि इस रात की भलाई से फ़ाएदा उठाएं वरना क़ौले नबी करीम ﷺ इसकी भलाई से महरूम रहने वाला हक़ीक़ी बद-क़िस्मत है इस रात का नाम लैलतुल् क़द्र इसलिए रखा गया है कि इसमें अल्लाह के हुक्म से फ़रिश्ते आने वाले साल की कुल तक़दीर लिखते हैं। जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया इसमें फ़रिश्ते रूहुल क़ुद्स (हज़रत जिब्रईल अलैहिस् सलाम) के साथ अपने रब के हुक्म से हर बात का इंतिज़ाम करने को उतरते हैं।

 सूरह दुख़ान में अल्लाह तआला फ़रमाते हैंفِيْهَا يُفْرَقُ كُلُّ اَمْرٍ حَكِيْمٍ ۝यानी इस रात में हर हिकमत वाले काम का फ़ैसला किया जाता है।

 क़द्र से मुराद ताज़ीम भी है, चूंकि इस रात में क़ुरआन का नुज़ूल हुवा इसलिए इसकी अज़मत बहुत ज़्यादा है। इसी रात को लैलतू मुबारका यानी बा-बरकत रात और सलामती वाली रात कहा। इस रात की सब से बड़ी बरकत यही है कि इसमें क़ुरआन जैसी अज़ीम नेअ्मत जो क़ियामत तक आने वाले इन्सानों के लिए हिदायत है नाज़िल की गई। इस रात की बरकत की ज़्यादती की वजह से ही फ़रिश्ते हज़रत जिब्रईल अलैहिस् सलाम के साथ नाज़िल होते हैं। हज़रत इब्न अब्बास रज़ियल्लाहू अन्हु का क़ौल है कि पूरा क़ुरआन लौहे महफूज़ से आस्मान अव्वल पर बैतुल् इज़्ज़ह में इसी रात उतरा। फिर तफ़्सील वार वाक़िआत के मुताबिक़ बतदरीज 23/साल में रसूले अकरम ﷺ पर नाज़िल हुवा।

अल्लाह तआला फ़रमाते हैं لَقَدْ كَانَ لَكُمْ فِيْ رَسُوْلِ اللّٰهِ اُسْوَةٌ حَسَنَةٌ (33:21)। यानी अल्लाह के रसूल ﷺ तुम्हारे लिए बेहतरीन नमूना हैं। शबे क़द्र की तलाश व जुस्तजू और इसमें इबादत के लिए नबी करीम ﷺ का तरीक़ा क्या था। इसके मुताल्लिक़
 अल्लाह के रसूल ﷺ का यह फ़रमाना कि शबे क़द्र को आख़िरी अश्रे में तलाश करो यानी शबे क़द्र आख़िरी अश्रे की ताक़ रातों में होती है। इसकी तअ्यीन नहीं की गई कि फ़ुलां रात में हर साल होगी जैसा कि
Hadees


 इस हदीस से इस बात की वज़ाहत हो जाती है कि शबे क़द्र किसी एक रात में मख़्सूस नहीं है इसी के साथ इसको बता कर भुला देने की हिकमत की वज़ाहत भी होती है कि लोग अल्लाह के फ़ज़्ल को तलाश करने में ज़्यादा से ज़्यादा महनत करें। इसी रात में क़ुरआन का नुज़ूल हुवा इसलिए क़ुरआन की तिलावत ब-कसरत करें, क़ियामुल्-लैल यानी तरावीह का ख़ुसूसी इहतिमाम करें। इसी रात में क़ुरआन का नुज़ूल हुवा इसलिए क़ुरआन की तिलावत ब-कसरत करें क़ियामुल्-लैल यानी तरावीह का ख़ुसूसी इहतिमाम करें। इस हदीस से यह बात भी अल्लाह के नबी ﷺ ने बता दी कि लड़ाई झगड़ा ख़ैर व बरकत और नफ़ा देने वाले इल्म को ग़ारत कर देता है। इसलिए रमज़ान में लड़ाई झगड़े और दूसरी लग़्वियात से दूर रहना चाहिए और अपना ज़्यादा वक़्त इबादते इलाही में गुज़रना चाहिए। हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हु ने कहा था हुज़ूर ﷺ लैलतुल् क़द्र में क्या पढूं? आप ने बतलाया कि यह दुआ ब-कसरत पढ़ा करोअल्लाहुम्मा इन्नक अ़फ़ूव् तुहिब्बुल् अ़फ़व फ़अफ़्वु अ़न्नी। ऐ अल्लाह तू माफ़ करने वाला है और माफ़ी को दोस्त रखता है, पस तू मेरी ख़ताएं माफ़ कर दे।
Hadees

हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा ने बयान किया जब (रमज़ान का) आख़िरी अश्रह आता तो नबी करीम ﷺ अपना तहबन्द मज़बूत बांधते (यानी अपनी कमर पूरी तरह कस लेते) और इन रातों में ख़ुद भी जागते और अपने घर वालों को भी जगाते। (हदीस नंबर 1888, बाब रमज़ान के आख़िरी अश्रह में ज़्यादा महनत करना। बुख़ारी शरीफ़)
शबे क़द्र के हुसूल के लिए आप ﷺ एतिकाफ़ फ़रमाते और अपने आप को इन अय्याम में अल्लाह की इबादत के लिए वक़्फ़ कर देते। और ज़्यादा से ज़्यादा इबादत में महनत करते। ख़ुद तो रातों को जागते ही अपने घर वालों को भी जगाते। इसलिए आप ﷺ के बअ्द अज़वाजे मुतह्हरात बराबर एतिकाफ़ किया करती थीं, क्यूंकि यह अल्लाह के रसूल ﷺ का हर रमज़ान का मामूल था। इस एतिकाफ़ में यह हिकमत समझ में आती है कि इन्सान साल भर अपने अहल व अयाल व मआश में मसरूफ़ रहता है। यह चंद दिन अल्लाह के लिए भी मख़्सूस करना चाहिए ताकि पूरी दिल जमई और लगन के सात इबादत की जाए। हमारे यहां मुआमला इसके बिल्कुल बरअक्स होता है। शुरू रमज़ान में बड़ी जां फशानी से इबादत की जाती है। तिलावत की जाती है लेकिन जैसे जैसे माहे रमज़ान गुज़रता है इबादत में कमी वाक़ेअ् होती चले जाती है। आख़िरी अश्रह में एतिकाफ़ तो बहुत दूर की बात है यहां तो फ़राइज़ से भी ग़फ़लत की जाने लगती है और ईद की तय्यारी में इबादत को फ़रामोश कर दिया जाता है। बजाए इसके कि आख़िरी अश्रह में शबे क़द्र की तलाश व जुस्तजू में ज़्यादा इबादत की जाए और अल्लाह का फ़ज़्ल हासिल किया जाए, मुसलमानों की अक्सरयत ख़रीद व फ़रोख़्त और अपनी मश्ग़ूलियात में मह्व रहती है। हमें मुसलमानों को इस तरफ़ ख़ुसूसी तवज्जह देने की ज़रूरत है और नबी ﷺ के तरीक़े पर अमल करते हुए ना सिर्फ़ ख़ुद जागना व इबादत करना चाहिए, बल्कि अहल व अयाल को भी इस पर ताकीद करना चाहिए।
मुख़्तलिफ़ आसार में इस रात की कुछ निशानियाँ बताई गई हैं। अबू-दाऊद तयालिसी में है कि रसूलुल्लाह ﷺ ने फ़रमाया कि लैलतुल् क़द्र पुरसुकून सर्दी व गर्मी से ख़ाली रात है, इसकी सुबह को सूरज मद्धम रौशनी वाला सुर्ख़ रंग निकलता है।

अल्लामह इब्न हजर रहिमहुल्लाह फ़रमाते हैं कि वह आसार बतौर इम्कान हैं बतौर शर्त के नहीं जैसा कि बअ्ज़ रिवायात में इस रात की एक अलामत बारिश होना भी बतलाया गया है, मगर कितने ही रमज़ान ऐसे गुज़र जाते हैं कि इनमें बारिश नहीं होती हालांकि इनमें लैलतुल् क़द्र का होना बरहक़ है। वह कहते हैं हम यह ऐतिक़ाद नहीं रखते कि लैलतुल् क़द्र को वही पहुंच सकता है जो कोई अम्र ख़र्क़ आदत देखे, बल्कि अल्लाह का फ़ज़्ल बहुत फ़राख़ है।
आख़िर में यही दुआ है कि रब्बुल आलमीन हमें माहे रमज़ान में इबादत में ज़्यादा महनत की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए और शबे क़द्र के हुसूल में हमारी मदद फ़रमाए। (आमीन)
लैलतु बारकह, शबे क़द्र या शबे बरात?
फ़ैज़ी ख़ालिद अख़्तर
शाबान की पंधरवी शब, शबे बरात के नाम से एक ख़ास मक्तबए फ़िक्र के अव्वाम और ख़वास में मक़बूलियत की हामिल है। मालेगांव में ख़ुसूसन जो अहमियत इसे दे दी गई है किसी दुसरे इलाक़े में शायद ही इसे इतनी ज़्यादा अहमियत हासिल हो। बअ्ज़ मक़ामात पर तो यह इस तरह गुज़र जाती है कि लोगों को इसका अहसास भी नहीं होने पाता। मालेगांव समेत हिन्दू पाक के बअ्ज़ शहरों में ख़ास तौर से इस रात को तहवार की हैसियत हासिल हो गई है और जितनी धूम धाम यहां नज़र आती है किसी दुसरे मक़ाम पर इतनी दिखाई नहीं देती। इसकी वजह यह है कि उलमा इसकी बहुत ज़्यादा फ़ज़ीलत बयान करते हैं। इस रात की फ़ज़ीलत पुरज़ोर सर्फ़ करने के लिए इन्हें ज़ईफ़ रिवायतों का सहारा भी लेना पड़ता है। और बअ्ज़ उलमा तो इसे क़ुरआन की सूरह दुख़ान की आयत नंबर तीन اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ فِيْ لَيْلَةٍ مُّبٰرَكَةٍ اِنَّا كُنَّا مُنْذِرِيْنَ ۝ बेशक हमने इसे बरकत वाली रात में उतारा बेशक हम डराने वाले हैं से इस्तिदलाल करते हैं। वह लैलए मुबारक को शबे बरात बताते हैं। हालांकि इनका यह इस्तिदलाल सहीह नहीं है। लैलए मुबारका से दर अस्ल मुराद लैलतुल् क़द्र (शबे क़द्र) है नाकि शबे बरात इस सिलसिले में हम मुख़्तलिफ़ मुफ़स्सिरीन की तफ़्सीरें पेश करते हैं ताकि इसकी मज़ीद वज़ाहत हो जाए और क़तई तौर से इसकी सहीह मुराद मुतअय्यन हो जाए।
मौलाना अहमद रज़ा खां साहिब के तर्जुमए क़ुरआन के हाश्या पर मौलाना नुऐमुद्दीन साहिब लिखते हैं। इस रात से या शबे क़द्र मुराद है या शबे बरात। मौलाना नुऐमुद्दीन साहिब के इस जुमले से ख़ुद यह बात बिल्कुल अयां है कि लैलए मुबारका की तअ्यीन में वह कोई क़तई राए पेश नहीं कर सके और ना ही कोई हतमी फ़ैसला और नतीजा दे सके। इनकी इस तफ़्सीर से ग़ैर यक़ीनिय्यत और तज़बज़ुब साफ़ ज़ाहिर होता है। इसलिए लैलए मुबारका से क़तई तौर पर शबे बरात ही मुराद लेना गुमान और तज़बज़ुब की बुनियाद पर यक़ीन व ऐतिमाद की इमारत तामीर करने के मुतरादिफ़ है। लैलए मुबारका के मुताल्लिक़ मौलाना नुऐमुद्दीन साहिब ने ना कोई मज़ीद तफ़्सील बयान की और ना ही अपने पेश्तर व मुफ़स्सिरीन की कोई राए ही नक़्ल की है बहुत ही इख़्तिसार से काम लेते हुए अपनी बात ख़त्म कर दी है। अब लैलए मुबारका से मुराद शबे बरात है या शबे क़द्र, इसके फ़ैसले और नतीजे के लिए हम दीगर मुफ़स्सिरीन की तफ़सीरों का भी जाएज़ा लेते हैं।
मौलाना शब्बीर अहमद उस्मानी साहिब लैलए मुबारका की तफ़्सीर के तहत लिखते हैं बरकत की रात शबे क़द्र है। اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ فِيْ لَيْلَةِ الْقَدْرِ ۝ (सूरह क़द्र, आयत नंबर 1) जो रमज़ान में वाक़ेअ् है बिक़ौलिही तआला شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِيْٓ اُنْزِلَ فِيْهِ الْقُرْاٰنُ (बक़रा।रुकूअ्,23), इस रात में क़ुरआने करीम लौहे महफूज़ से समाए दुनिया पर उतारा गया फ़िर बतदरीज 23/साल में पैग़म्बर पर उतरा। नीज़ इस शब में पैग़म्बर पर इसके नुज़ूल की इब्तिदा हुई। (स. 659) हाश्या नंबर 1) आगे वह क़ुरआन की इस आयत के हवाले से लिखते हैं فیہا یفرق کل امر حکیم۔ امراً من عندنا۔। इसमें जुदा होता है हर काम जांचा हुवा, हुक्म होकर हमारे पास से। इस आयत के तहत हाश्या 3, पर वह लिखते हैं यानी साल भर के मुताल्लिक़ क़ज़ा व क़द्र के हकीमाना और अटल फ़ैसले इसी अज़ीमुश् शान रात में लौहे महफूज़ से नक़्ल करके इन फ़रिश्तों के हवाले किए जाते हैं जो शुअ्बह हाए तक्वीनियात में काम करने वाले हैं। बअ्ज़ रिवायत से मालूम होता है कि वह शाबान की पंधरवी रात है जिसे शबे बरात कहते हैं। मुम्किन है वहां से इस काम की इब्तिदा और शबे क़द्र पर इंतिहा होती हो। वल्लाहु अअ्लम …इन्होंने लैलए मुबारका को क़ुरआन की दो आयतों से शबे क़द्र साबित किया है और जब यह बात साबित हो गई कि बरकत वाली रात दर अस्ल शबे क़द्र है तो आगे की आयतें भी शबे क़द्र के ही मुताल्लिक़ मानी जाएंगी। लेकिन इन्होंने बअ्ज़ रिवायतों से मालूम होता है कि वह शाबान की पंधरवी रात है जिसे शबे बरात कहते हैं। लिख कर शबे बरात की फ़ज़ीलत की गुंजाइश आख़िर निकाल ही ली। लेकिन इन्होंने बअ्ज़ रिवायतों में से किसी एक भी रिवायत का ज़िक्र नहीं किया और ना ही इस बात की सराहत की कि इन रिवायतों का क्या दर्जा है सहीह हैं या ज़ईफ़ और यह रिवायतें अहादीस़ की किन किताबों में हैं, इसका भी कोई इशारा नहीं दिया। बहर हाल इनका आगे का जुमला क़ाबिले ग़ौर है मुम्किन है वहां से इस काम की इब्तिदा होती हो और शबे क़द्र पर इंतिहा होती हो वल्लाहु अअ्लम मुम्किन है … के अल्फ़ाज़ से बख़ूबी अंदाज़ा होता है कि वह भी कोई क़तई बात नहीं कह सके और ना ही कोई हतमी फ़ैसला दे सके बल्कि मुतालआ करने वाला एक तरह से तज़बज़ुब में पड़ जाता है। ग़ौर करने की बात यह है कि जब यह रात इतनी ही बरकत वाली और फ़ज़ीलत की हामिल है तो कम अज़ कम इसके मुताल्लिक़ कोई क़तई बात ही इन्हें पेश करनी चाहिए थी। अगर इस बाब में वह बअ्ज़ रिवायतें सहीह और सरीह हैं तो जुमले को मुम्किन है, से शुरू करने के क्या माना? इससे तो यही साबित होता है कि वह बअ्ज़ रिवायतें सहीह दर्जे की नहीं हैं। अब यह रिवायतें सहीह हैं या ज़ईफ़ इसका अंदाज़ा लगाने के लिए हम दुसरे मुफ़स्सिरीन की तफ़्सीर देखेंगे।
अब्दुल्लाह यूसुफ़ अली साहिब अपने अंग्रेज़ी तर्जुमा क़ुरआन में लिखते हैं कि लैला मुबारका रमज़ान की ताक़ रातों में से कोई रात है। यानी वह भी लैला मुबारका को शबे क़द्र ही बताते हैं। उन्होंने इस सिलसिले में कोई मज़ीद तफ़्सील नहीं लिखी है।

मुफ़्ती मुहम्मद शफ़ी साहिब अपनी तफ़्सीर मआरिफ़ुल् क़ुरआन में लिखते हैं लैलतू मुबारकह से मुराद जुम्हूर मुफ़स्सिरीन के नज़दीक शबे क़द्र है जो रमज़ान के आख़िरी अश्रह में होती है, इस रात को मुबारक फ़रमाना इसलिए है कि इस रात में अल्लाह तआला की तरफ़ से अपने बन्दों पर बे शुमार ख़ैरात व बरकात नाज़िल होती हैं और क़ुरआने करीम का शबे क़द्र में नाज़िल होना सूरह क़द्र में तसरीह के साथ आया है, اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ فِيْ لَيْلَةِ الْقَدْرِ ۝ इससे ज़ाहिर हुवा कि यहां भी लैला मुबारका से मुराद शबे क़द्र ही है। (क़ुरतुबी 756-757) आगे वह मज़ीद लिखते हैं चूंकि बअ्ज़ रिवायाते हदीस में शबे बरात यानी शाबान की पंधरवी शब के मुताल्लिक़ भी आया है कि इसमें आजाल व अर्ज़ाक़ के फ़ैसले लिखे जाते हैं। इसलिए बअ्ज़ हज़रात ने आयते मज़कूरा में लैला मुबारका की तफ़्सीर लैला बरात से कर दी है मगर यह सहीह नहीं है क्यूंकि यहां इस रात में नुज़ूले क़ुरआन का ज़िक्र सब से पहले और इसका रमज़ान में होना क़ुरआन की नुसूस से मुतअय्यन है और शबे बरात के मुताल्लिक़ जो यह मज़मून बअ्ज़ रिवायात में आया है कि इसमें अर्ज़ाक़ वग़ैरा के फ़ैसले होते हैं, अव्वल तो इब्न कसीर ने इसके मुताल्लिक़ फ़रमाया कि यह रिवायत मुर्सल है और ऐसी रिवायत नुसूसे सरीहह के मुक़ाबले में क़ाबिले ऐतिमाद नहीं हो सक्ती। इसी तरह क़ाज़ी अबू बक्र इब्न अरबी ने फ़रमाया कि निस्फ़ शाबान की रात के बारे में कोई क़ाबिले ऐतिमाद रिवायत ऐसी नहीं जिस से साबित हो कि रिज़्क़ और मौत व हयात के फ़ैसले इस रात में होते हैं। बल्कि उन्होंने फ़रमाया कि इस रात की फ़ज़ीलत में भी कोई क़ाबिल ऐतिमाद हदीस नहीं आई है। (स. 758) क़ाज़ी अबू बक्र बिन अरबी की बात से तो यही साबित होता है कि जब वह क़ाबिले ऐतिमाद नहीं मानते तो इसे क़ाबिले अमल भी नहीं समझते। लेकिन मौलाना आगे लिखते हैं रहा शबे बरात की फ़ज़ीलत का मुआमला तो वह एक मुस्तक़िल मुआमला है जो बअ्ज़ रिवायत से मन्क़ूल है मगर वह अक्सर ज़ईफ़ हैं, इसीलिए क़ाज़ी अबू बक्र बिन अरबी ने इस रात की किसी भी फ़ज़ीलत से इनकार किया है। लेकिन शबे बरात की फ़ज़ीलत की रिवायात अगरचा बा ऐतेबारे सनद के ज़ोअ्फ़ से ख़ाली नहीं लेकिन ताद्दुदे तुरुक़ और ताद्दुदे रिवायात से इनको एक तरह की क़ुव्वत हासिल हो जाती है इसलिए बहुत से मशाइख़ ने इसे क़ुबूल किया है। क्यूंकि फ़ज़ाइले आमाल में ज़ईफ़ रिवायात पर अमल कर लेने की भी गुंजाइश है वल्लाहु आलम … मौलाना मोहतरम लिखते हैं कि बहुत से मशाइख़ की कितनी तादाद है। अबू बक्र इब्न अरबी का इस रात की किसी भी फ़ज़ीलत से इनकार का आख़िर मतलब क्या है? क्या वह भी ज़ईफ़ रिवायात पर अमल करने के क़ाइल हैं? जबकि इनकी बात से तो यही साबित होता है कि वह ज़ईफ़ रिवायात पर अमल के क़ाइल नहीं हैं … रह गया मुआमला ज़ईफ़ रिवायात पर अमल करने का तो इमाम बुख़ारी, इमाम मुस्लिम और दीगर मुहद्दिसीन ज़ईफ़ रिवायात पर अमल करने के क़ाइल नहीं हैं। इमाम मुस्लिम, मुस्लिम शरीफ़ के मुक़द्दमे में फ़रमाते हैं कि सहीह अहादीस़ ही क्या कम हैं कि इनके होते हुए ज़ईफ़ अहादीस़ पर अमल किया जाए और जो इबादात नबी करीम ﷺ से साबित ही ना हो, उस पर अमल करने की बात समझ में नहीं आती और ताज्जुब है कि इतनी बरकत व फ़ज़ीलत की रात के मुताल्लिक़ कोई भी रिवायत पाये सेहत को नहीं पहुंचती। जबकि इस सिलसिले में तो कई सहीह रिवायात होनी चाहिए थीं, यहीं ग़ौर करने का मक़ाम है कि आख़िर ऐसा क्यूं है ?

मौलाना अमीन अहसन इस्लाही साहिब अपनी तफ़्सीर तदब्बुरे क़ुरआन में लैलतुल् मुबारकह के तहत इस तरह रक़म तराज़ हैं लैला मुबारका से मुराद ज़ाहिर है लैलतुल् क़द्र है चुनांचे सूरह क़द्र में यह तसरीह मौजूद है कि इसी रात में अल्लाह तआला ने क़ुरआन उतारा اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ فِيْ لَيْلَةِ الْقَدْرِ … । वह आगे लिखते हैं इन तसरीहात से यह बात आप से आप वाज़ेह हो गई कि इससे शाबान या किसी और महीने की कोई रात मुराद लेने की कोई गुंजाइश नहीं है। (जिल्द।7, स. 268)

सय्यद अबुल् अअ्ला मौदूदी साहिब अपनी तफ़्सीर तफ़्हीमुल् क़ुरआन जिल्द चहारुम मेंفِيْهَا يُفْرَقُ كُلُّ اَمْرٍ حَكِيْمٍ ۝ यह वह रात है जिसमें हर मुआमले का हकीमाना फ़ैसला हमारे हुक्म से सादिर किया जाता है। के तहत हाश्या नंबर 3, में लिखते हैं। सूरह क़द्र में यही मज़मून इस तरह बयान किया गया है, تَنَزَّلُ الْمَلٰۗىِٕكَةُ وَ الرُّوْحُ فِيْهَا بِاِذْنِ رَبِّهِمْ ۚ مِنْ كُلِّ اَمْرٍ ۝। इस रात मलाइका और जिब्रईल अपने रब के इज़्न से हर तरह का हुक्म लेकर उतरते हैं। इससे मालूम हुवा कि अल्लाह तआला के शाही नज़्म व नसख़ में एक ऐसी रात है जिसमें वह अफ़राद और क़ौमों और मुल्कों की क़िस्मतों के फ़ैसले करके अपने फ़रिश्तों के हवाले कर देता है और फिर वह उन ही फ़ैसलों के मुताबिक़ अमल दरआमद करते रहते हैं। बअ्ज़ मुफ़स्सिरीन को जिन में इकरिमा सब से ज़्यादा नुमायां हैं यह शुबह लाहिक़ हुवा है कि यह निस्फ़ शाबान की रात है, क्यूंकि बअ्ज़ अहादीस़ में इसी रात के मुताल्लिक़ यह बात मन्क़ूल हुई है कि इसमें क़िस्मतों के फ़ैसले किए जाते हैं, लेकिन इब्ने अब्बास, इब्न उमर, मुजाहिद, क़तादा, हसन बसरी, सईद बिन जुबैर, इब्न ज़ैद, अबू मालिक, ज़ह्हाक और दुसरे बहुत से मुफ़स्सिरीन इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि यह रात रमज़ान की वही रात है जिसे लैलतुल क़द्र कहा गया है, इसलिए कि क़ुरआने मजीद इसकी तसरीह कर रहा है और जहां क़ुरआन की सराहत मौजूद हो वहां अख़बारे आहाद की बिना पर कोई दूसरी राए नहीं क़ायम की जा सक्ती। अल्लामह इब्न कसीर कहते हैं कि उस्मान बिन मुहम्मद की जो रिवायत इमाम ज़ुहरी ने शाबान से शाबान तक क़िस्मतों के फ़ैसले होने के मुताल्लिक़ नक़्ल की है वह एक मुर्सल रिवायत है और ऐसी रिवायत नुसूस के मुक़ाबले में नहीं लाई जा सक्ती। क़ाज़ी अबू बक्र इब्नुल् अरबी कहते हैं कि निस्फ़ शाबान की रात के मुताल्लिक़ कोई हदीस क़ाबिले ऐतिमाद नहीं है ना इसकी फ़ज़ीलत के बारे में और ना उस अम्र में कि इस रात क़िस्मतों के फ़ैसले होते हैं। लिहाज़ा इनकी तरफ़ इलतिफ़ात नहीं करना चाहिए। (अहकामुल् क़ुरआन) (तफ़्हीम क़ुरआन जिल्द 4, स. 56)

अल्लामह इब्न कसीर फ़रमाते हैं अल्लाह तबारक व तआला बयान फ़रमाता है कि इस अज़ीमुश् शान क़ुरआने करीम को बा-बरकत यानी लैलतुल् क़द्र में नाज़िल फ़रमाया जैसे इरशाद है। اِنَّآ اَنْزَلْنٰهُ فِيْ لَيْلَةِ الْقَدْرِ ۝ښ हमने इसे लैलतुल् क़द्र में नाज़िल फ़रमाया है और यह रात रमज़ानुल मुबारक में है। जैसे और आयत में हैشَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِيْٓ اُنْزِلَ فِيْهِ الْقُرْاٰنُ रमज़ान का महीना वह महीना है जिसमें क़ुरआने करीम उतारा गया। सूरह बक़रा में इसकी पूरी तफ़्सीर गुज़र चुकी है, इसलिए दोबारा नहीं लिखते। बअ्ज़ लोगों ने यह भी कहा है कि लैलए मुबारका जिसमें क़ुरआन शरीफ़ नाज़िल हुवा वह शाबान की पंधरवी रात है, लेकिन यह क़ौल सरासर तकल्लुफ़ वाला है इसलिए कि नस्से क़ुरआन में क़ुरआन का रमज़ान में नाज़िल होना साबित है और जिस हदीस में मरवी है कि शाबान में अगले शाबान तक के काम मुक़र्रर कर दिए जाते हैं यहां तक कि निकाह और औलाद का और मय्यत का होना भी, वह हदीस मुर्सल है और ऐसी हदीसों से नस्से क़ुरआनी का मुआरज़ा नहीं किया जा सकता।(स. 47, सूरह दुख़ान ज. 5)
ऊपर हमने जिन मुफ़स्सिरीन के हवाले नक़्ल किए हैं तक़रीबन तमाम ही इस बात पर मुत्तफ़िक़ हैं कि लैलतुल् मुबारकह से मुराद शबे क़द्र है नाकि शबे बरात। अगर हम लैला मुबारका से मुराद शबे बरात ले लें तो वह तमाम फ़ज़ीलतें भी जो शबे क़द्र से मुताल्लिक़ हैं, तमाम की तमाम शबे बरात के खाते ख़ुद बख़ूद मुन्तक़िल हो जाती है और इस तरह यह दोनों रातें यानी शबे क़द्र और शबे बरात हम पल्लह हो जाती हैं। अब इस पर इस ज़ाविए से ग़ौर किया जाए कि एक तरफ़ तो अल्लाह तआला ने नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को शबे क़द्र बताई कि वह रमज़ान की किस तारीख़ और किस शब में है, लेकिन मस्लिहतन आप के हाफ़िज़े से मह्व कर दी गई और रमज़ान के आख़िरी अश्रह में रख दी गई ताकि बन्दे इसकी जुस्तजू करें और फ़ज़ीलत और बरकत के हुसूल के लिए इसे रमज़ान के आख़िरी अश्रह में तलाश करें। इसी तरह बन्दों के ज़ौक़ व शौक़ और तलब व तमन्ना का इम्तिहान भी हो जाए और यह भी मालूम हो जाए कि अल्लाह के ज़्यादा सॉलेह बन्दे कौन लोग हैं और दूसरी तरफ़ हम यह देखते हैं कि शबे क़द्र ही की तरह फ़ज़ाइल व बरकात की हामिल शबे बरात मुतअय्यन कर दी गई। इस तरह तो वह तमाम हिकमतें और मस्लिहतें जो शबे क़द्र से मुताल्लिक़ हैं ख़त्म होती हुई नज़र आती हैं। आख़िर यह कैसे मुम्किन हो सक्ता है? इसलिए हम देखते हैं कि शबे क़द्र का इतना इहतिमाम नहीं किया जाता जितना कि शबे बरात का किया जाता है, क्यूंकि शबे बरात मुतअय्यन कर दी गई और शबे क़द्र ग़ैर मुतअय्यन है। दर अस्ल लोग जन्नत के मुख़्तसर रास्ते के ख़्वाहाँ हैं वह चाहते हैं कि कम अज़ कम इबादत करके ज़्यादा से ज़्यादा सिला हासिल करें। इसी फ़िक्र का यह नतीजा है कि मख़्सूस रातों और दिनों में नवाफ़िल का तो शानदार इहतिमाम किया जाता है और बाक़ी दिनों में फ़राइज़ से भी कोताही बरती जाती है। आख़िर में अल्लाह तआला से दुआ है कि हम सबको दीन की सहीह समझ अता फ़रमाए और नेक अमल की तौफ़ीक़ दे। आमीन!

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