एतिकाफ़ के लफ़्ज़ी माना या लुग़वी माना किसी चीज़ को अपने ऊपर लाज़िम कर लेना और अपने नफ़्स को इस पर मुक़य्यद कर देना है। और शरई माना यह हैं कि किसी भी मस्जिद में किसी मुक़र्रर आदमी की तरफ़ किसी मख़्सूस तरीक़े के साथ किसी जगह को लाज़िम कर लेना। एतिकाफ़ अगरचा वाजिब नहीं है, मगर अगर कोई शख़्स नज़्र माने या कि एतिकाफ़ करना शुरू कर दे मगर दरमियान में क़सदन छोड़ दे तो उसकी अदाएगी वाजिब है। (फ़त्हुल् बारी)
एतिकाफ़ के लिए मस्जिद का होना शर्त है। जो कि क़ुरआन की आयत से साबित है। रसूलुल्लाह ﷺ रमज़ान के आख़िरी अश्रे में एतिकाफ़ करते थे और आप ﷺ के बअ्द आप ﷺ की अज़वाज एतिकाफ़ करती रहीं। जैसा कि
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(बुख़ारी शरीफ़)
एतिकाफ़ की फ़ज़ीलत:
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एतिकाफ़ का मक़सूद!
एतिकाफ़ की रूह और उसका मक़्सद यह है कि क़ल्ब अल्लाह तआला के साथ वाबस्ता हो जाए। उसके साथ जमइय्यत बातनी हासिल हो। दुनियावी मसरूफ़ियतों से रिहाई नसीब हो और अल्लाह की इबादत की नेअ्मत मयस्सर आए और यह हाल हो जाए कि तमाम अफ़्कार व तरद्दुदाद और वहम व वसाविस की जगह अल्लाह का ज़िक्र और उसकी मुहब्बत ले ले। हर फ़िक्र उसकी फ़िक्र में ढल जाए और हर अहसास व ख़याल उसके ज़िक्र व फ़िक्र और उसकी रज़ा व क़ुर्ब के हुसूल की कोशिश के साथ हम आहंग हो जाए। मख़्लूक़ से इन्स के बजाए अल्लाह से इन्स पैदा हो और क़ब्र की वहशत में जब उसका कोई ग़म ख़्वार ना होगा। यह इन्स आख़िरत का ज़ादे सफ़र बने यह है एतिकाफ़ का मक़्सद जो रमज़ान के अफ़्ज़ल तरीन दिनों में यानी रमज़ान के आख़िरी अश्रह के साथ मख़्सूस है।
एतिकाफ़ में बीवी से मुलाक़ात:
मुअ्तकिफ़ एतिकाफ़ में मस्जिद के अन्दर अपनी बीवी से मुलाक़ात कर सकता है या यह कि मुअ्तकिफ़ की बीवी इससे मस्जिद में जाकर मुलाक़ात कर सक्ती है।
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(एक मरतबा जब रसूलुल्लाह ﷺ मस्जिद में मुअ्तकिफ़ थे तो आप ﷺ की बीवी सफ़िय्यह रज़ियल्लाहू अन्हा ने मस्जिद जाकर किसी ख़ास ज़रूरत के लिए आप ﷺ से मुलाक़ात की। (सहीह बुख़ारी))
मुस्तहाज़ह का एतिकाफ़:
मुस्तहाज़ह का एतिकाफ़ करना दुरुस्त है।
रसूलुल्लाह ﷺ की ज़ौजह उम्मे सलमा रज़ियल्लाहू अन्हा ने मस्जिदे नबवी में एतिकाफ़ किया, जबकि वह मुस्तहाज़ह थीं (यानी उनको मुसलसल ख़ून जारी रहता था।) हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा कहती हैं कि (कभी ख़ून इतना ज़्यादा होता था कि) अक्सर हम उनके नीचे तश्त रख देती थीं और वह नमाज़ पढ़ते रहती थीं। (बुख़ारी)
मुअ्तकिफ़ के लिए दीगर अहकामात:
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(2) हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा कहती हैं कि सुन्नत तरीक़ा यह है कि मुअ्तकिफ़ किसी मरीज़ की इयादत ना करे, ना नमाज़े जनाज़ा में शिरकत के लिए जाए, ना बीवी के साथ मुजामिअत करे, ना क़ज़ाए हाजत के अलावा किसी काम के लिए निकले। और बग़ैर रोज़े के एतिकाफ़ नहीं होता … (अबू-दाऊद)
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(3) एतिकाफ़ की नज़्र भी मानी जा सक्ती है।
(हज़रत उमर रज़ियल्लाहू अन्हु कहते हैं कि मैंने अय्यामे जाहिलियत में यह नज़्र मानती थी कि मैं एक रात मस्जिदे हराम में एतिकाफ़ करूंगा तो नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया कि अपनी नज़्र को पूरा करो। (सहीह बुख़ारी। सहीह मुस्लिम)
मुअ्तकिफ़ एतिकाफ़ में कब दाख़िल हो?
जो शख़्स रमज़ान के आख़िरी अश्रे का एतिकाफ़ करना चाहता हो बीसवें रमज़ान को दिन के आख़िरी हिस्से में आफ़्ताब ग़ुरूब होने से कुछ पहले मस्जिद में पहुंच जाए और इक्किसवीं तारीख़ की रात मस्जिद में गुज़ारें और मस्जिद के जिस गोशाह में उसके लिए एतिकाफ़ की जगह मुतअय्यन की गई है सुबह की नमाज़ से फ़ारिग़ होकर इस जाए मुअय्यना को एतिकाफ़ के लिए इख़्तियार करे।
हज़रत आइशा रज़ियल्लाहू अन्हा फ़रमाती हैं कि रसूलुल्लाह ﷺ जब एतिकाफ़ का इरादा करते तो फ़ज्र की नमाज़ पढ़ कर एतिकाफ़ की जगह में दाख़िल होते। (मुस्लिम, अबू-दाऊद)
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